Tuesday, March 3, 2026
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कृषि वैज्ञानिकों की बड़ी मांग : भारत की आनुवंशिक संपदा के उपयोग और किसानों के हित में ठोस कदम उठाए सरकार

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जीएम फसलों के नियमन में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कड़े किए जाएंगे नियम।

जीएम फसलों के नियमन में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कड़े किए जाएंगे नियम।
– फोटो : गांव जंक्शन

विस्तार


आनुवंशिक संसाधनों के इस्तेमाल की एवज में ऐसा करने वाली कंपनियों द्वारा एक बहुपक्षीय मंच पर इसका लाभ साझा करने के प्रावधानों में बदलाव करने के प्रस्तावित कदम पर कृषि वैज्ञानिकों के एक समूह ने आपत्ति जताई है। भारतीय वैज्ञानिकों के समूह ने इस मामले को लेकर लीमा में होने वाली आगामी बातचीत में सरकार से रणनीतिक हस्तक्षेप करने के लिए सोमवार को आह्वान किया है ताकि देश के आनुवंशिक संसाधनों पर उसके संप्रभु अधिकारों की रक्षा की जा सके।बता दें कि यह मुद्दा 24 से 29 नवंबर तक पेरू के लीमा में खाद्य और कृषि के लिए पादप आनुवंशिक संसाधनों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (ITPGRFA) के शासी निकाय के 11वें सत्र में चर्चा के लिए निर्धारित है।समूह ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को लिखे अपने पत्र में इस बात पर जोर दिया है कि संधि की बहुपक्षीय प्रणाली को “बढ़ाने” के मौजूदा प्रस्ताव मौलिक रूप से अनुचित हैं।

आनुवंशिक संपदा पर अधिकार का सवाल 
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के प्रावधान भारत की विशाल आनुवंशिक संपदा पर उसके संप्रभु अधिकारों और उसके किसानों के मौलिक अधिकारों के लिए खतरा पैदा करते हैं, जो सदियों से इस विविधता के संरक्षक रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कदम प्रभावी रूप से भारत के राष्ट्रीय बीज संग्रह के एक बड़े हिस्से को, अगर सब कुछ नहीं तो, एक उचित और अनिवार्य मुआवजे की व्यवस्था सुनिश्चित किए बिना वैश्विक पहुंच के लिए खोल देगा।

अनुसंधान के लिए साझा किए जाते हैं आनुवंशिक संसाधन 
आपको बता दें कि आनुवंशिक संसाधन कानून के तहत चिकित्सा और कृषि में अनुसंधान और प्रगति के लिए साझा किए जाते हैं। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि ऐसे संसाधनों तक पूर्ण पहुंच – 64 फसलों की मौजूदा सूची से परे – बातचीत के माध्यम से पहुंच के बजाय किसी राष्ट्र के अपने आनुवंशिक संसाधनों पर संप्रभु अधिकारों से काफी समझौता कर सकती है और जैव विविधता अधिनियम जैसे घरेलू कानूनों को दरकिनार कर सकती है।

आनुवंशिक विविधता – भविष्य की खाद्य सुरक्षा की नींव
इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के प्रोफेसर और चौहान को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले वैज्ञानिकों में से एक दिनेश अब्रोल ने कहा, “भारत की विशाल आनुवंशिक विविधता – हमारी भविष्य की खाद्य सुरक्षा की नींव – को बिना मुआवजे के नहीं दिया जाना चाहिए।” 

अरबों कमा रहीं कंपनियां, किसानों को नहीं मिलता फायदा 
भारत जैसे जैव विविधता से समृद्ध देशों में उत्पन्न करीब 70 लाख आनुवंशिक नमूने (जैसे बीजों की किस्में) दुनिया भर में बांटे जा चुके हैं। इन आनुवंशिक संसाधनों के जरिए बड़ी-बड़ी बीज और बायोटेक कंपनियां अरबों रुपये कमा रही हैं। लेकिन, इन संसाधनों की एवज में लाभांश बांटने का मौजूदा तरीका सिर्फ कंपनियों की इच्छा पर छोड़ दिया गया है – यानी कंपनियां चाहें तो इसका आर्थिक लाभ दें, और न चाहें तो न दें। इसका नतीजा ये हुआ है कि आनुवंशिक संसाधन प्रदान करने वाले देशों को मुश्किल से ही कुछ पैसे मिलते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये सिस्टम अब पूरी तरह फेल हो चुका है।

किसानों की जेनेटिक मेहनत से कंपनियों को ज्यादा मुनाफा
स्वेच्छा से लाभांश देने के मामले में प्लांट प्रोटेक्शन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट और एक और सिग्नेटरी सरत बाबू बलिजेपल्ली ने कहा, “वॉलंटरी सिस्टम एक धोखा है। यह अमीर कंपनियों को हमारे किसानों की जेनेटिक मेहनत से बहुत ज्यादा मुनाफा कमाने की इजाजत देता है, बिना उनका सही हिस्सा दिए।” उन्होंने कहा, “अब हमें एक ‘अनिवार्य सब्सक्रिप्शन सिस्टम’ बनाना होगा, जो इन जेनेटिक संसाधनों का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों के कमर्शियल टर्नओवर से सीधे जुड़ा हो।” 

भारत को अपने संप्रभु नियंत्रण पर जोर देना चाहिए
रिसर्च और एडवोकेसी ऑर्गनाइजेशन जीन कैंपेन की चेयरपर्सन सुमन सहाय और सोमा मारला और बी. सरत बाबू, जो ICAR-NBPGR के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक रहे हैं, ने केंद्रीय मंत्री से अपनी संयुक्त अपील में कहा है कि अब परोक्ष बातचीत का समय खत्म हो गया है और भारत को अब ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करते हुए अपने संप्रभु नियंत्रण पर जोर देना चाहिए और विकासशील देशों के किसान समुदायों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए।

कानून-व्यवस्था मजबूत करने के लिए यूपी पुलिस को मिलेंगे नए वज्र वाहन, कैबिनेट ने 9.70 करोड़ की खरीद मंजूर दी

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लखनऊ। प्रदेश की कानून-व्यवस्था को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से सरकार ने पुलिस बेड़े को अत्याधुनिक संसाधनों से लैस करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है। संवेदनशील शहरों में दंगा नियंत्रण क्षमता बढ़ाने के लिए जल्द ही पुलिस को नए वज्र वाहन उपलब्ध कराए जाएंगे। राज्य कैबिनेट ने इन दंगा नियंत्रण वाहनों की खरीद के लिए 9.70 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दे दी है।

इसलिए लिया गया फैसला

सरकार का मानना है कि बड़े शहरों और संवेदनशील जिलों में कई बार अचानक उत्पन्न भीड़ नियंत्रण, सांप्रदायिक तनाव या आपात स्थितियों से निपटना पुलिस के लिए चुनौती बन जाता है। ऐसी परिस्थितियों में वज्र वाहन न केवल सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं, बल्कि भीड़ नियंत्रित करने, तनावग्रस्त क्षेत्रों में पुलिस बल की सुरक्षित तैनाती और राहत कार्यों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी जरूरत को देखते हुए इन वाहनों की संख्या बढ़ाने का फैसला लिया गया है।

पिछले वर्ष भी उत्तर प्रदेश पुलिस को 41 दंगा नियंत्रण वाहनों के लिए बजट स्वीकृत किया गया था, जिसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। अब एक बार फिर, इनकी संख्या बढ़ने से पुलिस की ऑपरेशनल क्षमता और तत्परता दोनों में वृद्धि होगी। अधिकारियों के अनुसार वज्र वाहनों को उन जिलों में प्राथमिकता से भेजा जाएगा, जहां अक्सर भीड़-भाड़ वाली स्थितियां बनती हैं या जहां कानून-व्यवस्था को लेकर विशेष सतर्कता की जरूरत रहती है।

पुलिस देगी प्रभावी प्रतिक्रिया

नई स्वीकृति के बाद पुलिस विभाग अब इन वाहनों की खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी में है। उम्मीद है कि वित्तीय मंजूरी के बाद जल्द ही नए वज्र वाहन प्रदेश की प्रमुख इकाइयों में पहुँच जाएंगे। इससे न केवल बड़े आयोजनों और त्योहारों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होगी, बल्कि अचानक उत्पन्न तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी पुलिस त्वरित और प्रभावी प्रतिक्रिया दे सकेगी।

 

 

कृषि वैज्ञानिकों की बड़ी मांग : भारत की आनुवंशिक संपदा के उपयोग और किसानों के हित में ठोस कदम उठाए सरकार

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जीएम फसलों के नियमन में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कड़े किए जाएंगे नियम। – फोटो : गांव जंक्शन

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आनुवंशिक संसाधनों के इस्तेमाल की एवज में ऐसा करने वाली कंपनियों द्वारा एक बहुपक्षीय मंच पर इसका लाभ साझा करने के प्रावधानों में बदलाव करने के प्रस्तावित कदम पर कृषि वैज्ञानिकों के एक समूह ने आपत्ति जताई है। भारतीय वैज्ञानिकों के समूह ने इस मामले को लेकर लीमा में होने वाली आगामी बातचीत में सरकार से रणनीतिक हस्तक्षेप करने के लिए सोमवार को आह्वान किया है ताकि देश के आनुवंशिक संसाधनों पर उसके संप्रभु अधिकारों की रक्षा की जा सके।

बता दें कि यह मुद्दा 24 से 29 नवंबर तक पेरू के लीमा में खाद्य और कृषि के लिए पादप आनुवंशिक संसाधनों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (ITPGRFA) के शासी निकाय के 11वें सत्र में चर्चा के लिए निर्धारित है।समूह ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को लिखे अपने पत्र में इस बात पर जोर दिया है कि संधि की बहुपक्षीय प्रणाली को “बढ़ाने” के मौजूदा प्रस्ताव मौलिक रूप से अनुचित हैं।

आनुवंशिक संपदा पर अधिकार का सवाल 
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के प्रावधान भारत की विशाल आनुवंशिक संपदा पर उसके संप्रभु अधिकारों और उसके किसानों के मौलिक अधिकारों के लिए खतरा पैदा करते हैं, जो सदियों से इस विविधता के संरक्षक रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कदम प्रभावी रूप से भारत के राष्ट्रीय बीज संग्रह के एक बड़े हिस्से को, अगर सब कुछ नहीं तो, एक उचित और अनिवार्य मुआवजे की व्यवस्था सुनिश्चित किए बिना वैश्विक पहुंच के लिए खोल देगा।

अनुसंधान के लिए साझा किए जाते हैं आनुवंशिक संसाधन 
आपको बता दें कि आनुवंशिक संसाधन कानून के तहत चिकित्सा और कृषि में अनुसंधान और प्रगति के लिए साझा किए जाते हैं। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि ऐसे संसाधनों तक पूर्ण पहुंच – 64 फसलों की मौजूदा सूची से परे – बातचीत के माध्यम से पहुंच के बजाय किसी राष्ट्र के अपने आनुवंशिक संसाधनों पर संप्रभु अधिकारों से काफी समझौता कर सकती है और जैव विविधता अधिनियम जैसे घरेलू कानूनों को दरकिनार कर सकती है।

आनुवंशिक विविधता – भविष्य की खाद्य सुरक्षा की नींव
इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के प्रोफेसर और चौहान को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले वैज्ञानिकों में से एक दिनेश अब्रोल ने कहा, “भारत की विशाल आनुवंशिक विविधता – हमारी भविष्य की खाद्य सुरक्षा की नींव – को बिना मुआवजे के नहीं दिया जाना चाहिए।” 

अरबों कमा रहीं कंपनियां, किसानों को नहीं मिलता फायदा 
भारत जैसे जैव विविधता से समृद्ध देशों में उत्पन्न करीब 70 लाख आनुवंशिक नमूने (जैसे बीजों की किस्में) दुनिया भर में बांटे जा चुके हैं। इन आनुवंशिक संसाधनों के जरिए बड़ी-बड़ी बीज और बायोटेक कंपनियां अरबों रुपये कमा रही हैं। लेकिन, इन संसाधनों की एवज में लाभांश बांटने का मौजूदा तरीका सिर्फ कंपनियों की इच्छा पर छोड़ दिया गया है – यानी कंपनियां चाहें तो इसका आर्थिक लाभ दें, और न चाहें तो न दें। इसका नतीजा ये हुआ है कि आनुवंशिक संसाधन प्रदान करने वाले देशों को मुश्किल से ही कुछ पैसे मिलते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये सिस्टम अब पूरी तरह फेल हो चुका है।

किसानों की जेनेटिक मेहनत से कंपनियों को ज्यादा मुनाफा
स्वेच्छा से लाभांश देने के मामले में प्लांट प्रोटेक्शन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट और एक और सिग्नेटरी सरत बाबू बलिजेपल्ली ने कहा, “वॉलंटरी सिस्टम एक धोखा है। यह अमीर कंपनियों को हमारे किसानों की जेनेटिक मेहनत से बहुत ज्यादा मुनाफा कमाने की इजाजत देता है, बिना उनका सही हिस्सा दिए।” उन्होंने कहा, “अब हमें एक ‘अनिवार्य सब्सक्रिप्शन सिस्टम’ बनाना होगा, जो इन जेनेटिक संसाधनों का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों के कमर्शियल टर्नओवर से सीधे जुड़ा हो।” 

भारत को अपने संप्रभु नियंत्रण पर जोर देना चाहिए
रिसर्च और एडवोकेसी ऑर्गनाइजेशन जीन कैंपेन की चेयरपर्सन सुमन सहाय और सोमा मारला और बी. सरत बाबू, जो ICAR-NBPGR के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक रहे हैं, ने केंद्रीय मंत्री से अपनी संयुक्त अपील में कहा है कि अब परोक्ष बातचीत का समय खत्म हो गया है और भारत को अब ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करते हुए अपने संप्रभु नियंत्रण पर जोर देना चाहिए और विकासशील देशों के किसान समुदायों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए।

एसटी की आय वृद्धि के लिए 'पंचसूत्री' – परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक

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एसटी की आय वृद्धि के लिए 'पंचसूत्री' - परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक

महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम (state transport) ने आय वृद्धि, दक्षता और यात्री सुविधाओं में सुधार के लिए एक व्यापक ‘पंचसूत्री योजना’ तैयार की है। परिवहन मंत्री और एसटी निगम के अध्यक्ष प्रताप सरनाईक ने डिपो स्तर से लेकर क्षेत्रीय कार्यालय तक के अधिकारियों और कर्मचारियों की ज़िम्मेदारियों को और स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्होंने एसटी निगम को सुधार, ‘गति’ और ‘नियमितता’ के आधार पर आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।(Panchsutra for increasing the income of ST Transport Minister Pratap Sarnaik)

प्रशासन दैनिक बैठकों के लिए तैयार

एसटी खुद को एक ‘चलती संस्था’ के रूप में परिभाषित करता है। इसके लिए डिपो में सुबह 10 बजे, मंडल स्तर पर सुबह 11 बजे और क्षेत्रीय स्तर पर दोपहर 12 बजे समीक्षा बैठक अनिवार्य कर दी गई है। बैठक में यात्रियों की सभी शिकायतों, रद्दीकरण, खराब वाहनों, अनुपस्थित कर्मचारियों की जाँच करके कार्यप्रणाली में तत्काल सुधार लाने के निर्देश दिए गए।

अगले दिन की परिवहन योजना डिपो, मंडल और क्षेत्रीय स्तर पर शाम 4 से 6 बजे तक बनाई जाएगी। यात्राओं से लेकर बाज़ारों तक और स्कूल ट्रिप से लेकर अचानक भीड़भाड़ तक, डिपो हर परिस्थिति के लिए तैयार रहेगा।

चालकों के लिए स्पष्ट लक्ष्य – दक्षता पर ज़ोर

डीज़ल, राज्य परिवहन निगम के खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसलिए, चालकों को केपीटीएल (प्रति 10 लीटर किलोमीटर) के अनुसार दैनिक लक्ष्य दिया जाएगा। जिन चालकों के पास केपीटीएल की कमी होगी, उन्हें आवश्यकतानुसार क्षेत्रीय स्तर पर परामर्श, प्रशिक्षण और उन्नत प्रशिक्षण दिए जाने की योजना बनाई गई है।

चूँकि टिकट बिक्री राजस्व की जीवनरेखा है, इसलिए कंडक्टरों को डिपो के दैनिक सीपीकेएम (प्रति किलोमीटर संचयी राजस्व) के अनुसार आय का स्पष्ट लक्ष्य दिया जाएगा। यदि आय कम है, तो परामर्श, कार्यभार परिवर्तन या मौखिक/लिखित समझौते का उपयोग किया जाएगा। लगातार कम आय वाले वाहकों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

समय-सारणी प्रबंधन में सुधार की बयार

राज्य परिवहन निगम की समय-सारणी को इसकी परिवहन प्रणाली की ‘आत्मा’ माना जाता है। लंबी दूरी की समानांतर बसों की शिकायतों को ध्यान में रखते हुए, अब सभी समय-सारणी का वैज्ञानिक पुनर्मूल्यांकन शुरू किया जा रहा है। निर्देश दिए गए हैं कि केवल केंद्रीय कार्यालय द्वारा अनुमोदित मार्गों का ही संचालन किया जाए।

1 जनवरी को बस स्टॉपवार नई समय-सारिणी प्रकाशित की जाएगी और सोशल मीडिया के माध्यम से इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा। यह समय की पाबंदी और नियमितता को राज्य परिवहन निगम की नई पहचान बनाने के संकल्प को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

लंबी और मध्यम दूरी की बसों के लिए नए मानदंड

लंबी और मध्यम दूरी की बसों के प्रबंधन में कई सुधार किए जा रहे हैं, जैसे आरक्षण के लिए उपलब्ध बसों की संख्या बढ़ाना, लोड फैक्टर को 80 प्रतिशत से कम न रखना, अच्छे लोड फैक्टर वाले दिनों में अतिरिक्त फेरे उपलब्ध कराना और प्रत्येक फेरे की निगरानी पर्यवेक्षकों द्वारा करते हुए ‘अपनाया’ आधार पर बस फेरे उपलब्ध कराना। इसके साथ ही, ऑनलाइन और मोबाइल ऐप के माध्यम से आरक्षण को बढ़ावा देने का भी इरादा है।

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महाराष्ट्र के निजी प्रसूति अस्पतालों में मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए 'लक्ष्य-प्रमाणन' अभियान

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राज्य सरकार के जन स्वास्थ्य विभाग ने राज्य के निजी प्रसूति अस्पतालों में सेवा की गुणवत्ता बढ़ाकर मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए “लक्ष्य-प्रमाणन” नामक एक अभिनव पहल शुरू की है। यह पहल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पहल और संकल्पना पर शुरू की गई है।(campaign to reduce maternal mortality in private maternity hospitals in Maharashtra)

सभी निजी अस्पतालों शुरू होगी ये पहल 

यह पहल राज्य के सभी निजी अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण, सुरक्षित और सम्मानजनक प्रसूति देखभाल सुनिश्चित करने के लिए लागू की जा रही है। महाराष्ट्र ने पिछले कुछ वर्षों में मातृ मृत्यु दर को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है और अब इस प्रयास को निजी क्षेत्र तक भी बढ़ा दिया गया है।

प्रसव के दौरान मातृ और नवजात शिशु मृत्यु दर को कम करना मुख्य उद्देश

“लक्ष्य-मान्यता” कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य प्रसव के दौरान मातृ और नवजात शिशु मृत्यु दर को कम करना, निजी अस्पतालों में सेवा की गुणवत्ता, रोगी सुरक्षा और रोगी देखभाल में सुधार करना और प्रत्येक महिला के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक प्रसव अनुभव सुनिश्चित करना है।

यह पहल महाराष्ट्र सरकार के लोक स्वास्थ्य विभाग, भारतीय प्रसूति एवं स्त्री रोग सोसायटी संघ (FOGSI) और अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन, Jhpiego के सहयोग से कार्यान्वित की जा रही है।Jhpiego, FOGSI और निजी अस्पतालों को आवश्यक तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और मूल्यांकन सहायता प्रदान करेगा।

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महाराष्ट्र – कुष्ठ खोज अभियान के तहत राज्य में 17 नवंबर से 2 दिसंबर तक घर-घर जाँच

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केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों की तरह इस वर्ष भी राज्य में कुष्ठ खोज अभियान चलाया जा रहा है। राज्य के सभी जिलों में 17 नवंबर से 2 दिसंबर, 2025 तक व्यापक सर्वेक्षण के माध्यम से कुष्ठ रोगियों की खोज का अभियान चलाया जाएगा।(House to house screening in the state from November 17 to December 2 under the Leprosy Detection Campaign)

1 करोड़ 73 लाख 25 हज़ार घरों का चयन 

इस वर्ष के अभियान में सर्वेक्षण के लिए 8.66 करोड़ जनसंख्या और 1 करोड़ 73 लाख 25 हज़ार घरों का चयन किया गया है, और इस अभियान के लिए 65,832 टीमें और 13,166 पर्यवेक्षक नियुक्त किए गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक टीम प्रतिदिन 20 घरों का दौरा करेगी और शहरी क्षेत्रों में 25 से 30 घरों का दौरा कर शारीरिक जाँच की जाएगी। प्रत्येक टीम में एक आशा स्वयंसेवक और एक पुरुष स्वयंसेवक होंगे, और वे लगातार 14 दिनों तक सर्वेक्षण करेंगे।

जन जागरूकता समिति की बैठक

कुष्ठ रोगी खोज अभियान की राज्य स्तरीय जन जागरूकता समिति की बैठक स्वास्थ्य सेवा आयुक्त और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन निदेशक डॉ. कादंबरी बलकवड़े की उपस्थिति में हुई। बैठक की अध्यक्षता स्वास्थ्य सेवा (क्षय रोग एवं कुष्ठ रोग) के संयुक्त निदेशक डॉ. राजरत्न वाघमारे, राज्य स्वास्थ्य शिक्षा एवं संचार विभाग के सहायक निदेशक डॉ. संजयकुमार जठार, दूरदर्शन प्रतिनिधि डॉ. आलोक खोबरागड़े, आकाशवाणी मुंबई के राजेश शेजवाले, अलर्ट इंडिया के वरिष्ठ प्रोग्रामर विंसेंट के.ए., ‘अपल’ की अध्यक्ष माया रणवारे, महाराष्ट्र कुष्ठ पीड़ित संघ की सदस्य मदीना शेख, राज्य जागरण समिति के सदस्य विकास सावंत बैठक में उपस्थित थे।

कुष्ठ रोगी खोज अभियान में अधिक से अधिक कुष्ठ रोगियों का निदान करने पर जोर

लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री प्रकाश अबितकर ने सभी जिलों के पालक मंत्रियों, जिलाधिकारियों और गांवों के सरपंचों को पत्र लिखकर इस अभियान को सफल बनाने की अपील की है। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री प्रकाश अबिटकर ने पत्र में अपील की है कि उनके कुशल नेतृत्व में इस अभियान को सफल बनाया जाए और सभी एजेंसियों को निर्देशित किया जाए कि वे अपने जिले में कुष्ठ रोगी खोज अभियान में अधिक से अधिक कुष्ठ रोगियों का निदान करें।

सभी जिला कलेक्टरों को पत्र

स्वास्थ्य विभाग के मुख्य सचिव डॉ. निपुण विनायक ने इस अभियान की विस्तृत समीक्षा की है और सभी जिला कलेक्टरों को पत्र के माध्यम से इस अभियान को सफल बनाने की अपील की है। राज्य के नागरिकों से भी सहयोग की अपील की गई है, साथ ही स्वास्थ्य विभाग ने यह भी बताया है कि सभी सरकारी स्वास्थ्य प्रणालियों के माध्यम से कुष्ठ रोग का उपचार पूरी तरह से निःशुल्क, प्रभावी और आसानी से उपलब्ध है।

यह भी पढ़ें – मुंबई में सेंट्रल रेलवे मजदूर संघ की वर्क-टू-रूल नीति की धमकी

डीज़ल, पेट्रोल और पेट्रोलियम जैसे तरल पदार्थों के अनधिकृत भंडारण और बिक्री के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई

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डीज़ल, पेट्रोल और पेट्रोलियम जैसे तरल पदार्थों के अनधिकृत भंडारण और बिक्री के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई

मुंबई ठाणे राशन वितरण प्रणाली द्वारा टैगोर नगर, गुरुद्वारा, विक्रोली (पूर्व), मुंबई के पास डीज़ल, पेट्रोल और पेट्रोलियम जैसे तरल पदार्थों के अनधिकृत भंडारण और बिक्री के विरुद्ध कार्रवाई की गई। इस कार्रवाई में, कुल 33,51,719/- रुपये मूल्य का अनुमानित 14,795 लीटर पेट्रोल और डीज़ल का स्टॉक और एक टेंपो ज़ब्त किया गया, यह जानकारी नियंत्रक, राशन वितरण एवं निदेशक नागरिक आपूर्ति, मुंबई कार्यालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से दी है।(Strict action against unauthorized storage and sale of liquids like diesel, petrol and petroleum)

संबंधित दोषियों के विरुद्ध मामला दर्ज

इस मामले में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत कार्रवाई की गई है और संबंधित दोषियों के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है। मुंबई-ठाणे राशन वितरण क्षेत्र में पेट्रोल, डीजल और पेट्रोलियम उत्पादों का सुचारू वितरण सुनिश्चित करने और इसमें किसी भी प्रकार की गड़बड़ी न हो, इसके लिए राशन नियंत्रक और नागरिक आपूर्ति निदेशक के मार्गदर्शन में एक सतर्कता दल का गठन किया गया है। इस सतर्कता दल के माध्यम से आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत निम्नलिखित कार्रवाई की गई है।

33,51,719/- रुपये मूल्य का अनुमानित 14,795 लीटर पेट्रोल और डीजल का स्टॉक और एक टेम्पो जब्त 

9 नवंबर, 2025 को प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि टैंकर क्रमांक MH 43 CE 6278 की सील अवैध रूप से हटा दी गई थी और टैंकर से पेट्रोल को अपने निजी लाभ के लिए कालाबाजारी में बेचा जा रहा था। अधिकारी और पंचायत के समक्ष की गई कार्रवाई में टैंकर चालक लाल बहादुर रामनयन हरजन, टैंकर क्लीनर पिंटू गौतम और सुखविंदर सिंह अजीतसिंह सैनी तथा टैंकर क्रमांक एमएच 43 सीई 6278 के मालिक के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (अपराध अभिलेख क्रमांक 0594/2025) के तहत मामला दर्ज किया गया है। इस कार्रवाई में कुल 33,51,719/- रुपये मूल्य का अनुमानित 14,795 लीटर पेट्रोल और डीजल का स्टॉक और एक टेम्पो जब्त किया गया है।

इस कार्रवाई में राशन वितरण के सहायक निरीक्षक रामकृष्ण कांबले ने विक्रोली पुलिस स्टेशन में कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। 

यह भी पढ़ें – जे. जे. अस्पताल के विस्तार के लिए छह एकड़ जमीन की मांग

हिमाचल में बाहर से आते हैं 80% बीज: नौणी यूनिवर्सिटी की आत्मनिर्भर बीज क्रांति, 5 FPC के साथ शुरू किया उत्पादन

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बीज उत्पादन

बीज उत्पादन
– फोटो : सोशल मीडिया

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हिमाचल प्रदेश में खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले 80 प्रतिशत बीज अन्य राज्यों से आते हैं। राज्य बीज प्रमाणन एजेंसी के 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार, यह निर्भरता प्राकृतिक खेती के विस्तार में बड़ी बाधा बन रही है। डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी ने प्राकृतिक खेती को मजबूत करने के लिए किसान उत्पादक कंपनियों (FPC) के माध्यम से स्थानीय बीज उत्पादन शुरू किया है। यह परियोजना बायोवर्सिटी इंटरनेशनल और CIAT द्वारा वित्त पोषित है।  प्राकृतिक खेती जलवायु-अनुकूल, पर्यावरण-अनुकूल और कम लागत वाली प्रणाली के रूप में तेजी से उभर रही है। हिमाचल में 2.2 लाख से अधिक किसान इसे अपना चुके हैं। विश्वविद्यालय के शोध निदेशक डॉ. संजीव चौहान ने बताया कि रसायनों का उपयोग न करके स्थानीय संसाधनों पर निर्भरता ही इसकी ताकत है।  

परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. सुधीर वर्मा ने बताया कि पांच FPC को क्षेत्रीय फसलों के अनुसार जिम्मेदारी दी गई है। करसोग में अनाज, बाजरा और सब्जियों के बीज तैयार किए जाएंगे। चौपाल में अनाज, व सब्जियों, पच्छाद एवं सोलन में अनाज, सब्जियां, लहसुन व अदरक और सुंदरनगर में अनाज व सब्जियों के बीज तैयार किए जाएंगे। 

विश्वविद्यालय का वैज्ञानिक सहयोग
विश्वविद्यालय वैज्ञानिक बीज संग्रह, संरक्षण, गुणन और वितरण के लिए प्रोटोकॉल विकसित करेंगे। साथ ही आणविक और पोषण प्रोफाइलिंग भी की जाएगी।

बीज आत्मनिर्भरता क्यों जरूरी
डॉ. चौहान ने कहा, “प्राकृतिक खेती के बीजों की मांग आपूर्ति से कहीं अधिक है। बाहरी या रासायनिक बीजों का उपयोग प्राकृतिक खेती के उद्देश्य को कमजोर करता है। बीजों में आत्मनिर्भरता ही इसकी दीर्घकालिक सफलता की कुंजी है।”

विकेंद्रीकृत प्रणाली और सामुदायिक बैंक
FPC के माध्यम से विकेंद्रीकृत शासन को बढ़ावा दिया जाएगा। चयनित FPC में सामुदायिक बीज बैंक स्थापित किए जाएंगे। कम लागत वाली, जलवायु-अनुकूल भंडारण संरचना बनेगी। मिट्टी के घड़े, कोठार और डिब्बों जैसे पारंपरिक तरीकों को बेहतर वेंटिलेशन और लेबलिंग के साथ पुनर्जीवित किया जाएगा।  

कुलपति प्रो. राजेश्वर चंदेल ने कहा, “ यह पहल स्थानीय स्तर पर जलवायु-अनुकूल बीज सस्ते दामों पर उपलब्ध कराएगी, जिससे किसानों की महंगे हाइब्रिड बीजों पर पर निर्भरता कम होगी। पर्यावरणीय रूप से जैव विविधता बढ़ेगी, कार्बन फुटप्रिंट घटेगा। सामाजिक रूप से रोजगार बनेगा और पारंपरिक ज्ञान को सम्मान मिलेगा।”  

हिमाचल में बाहर से आते हैं 80% बीज: नौणी यूनिवर्सिटी की आत्मनिर्भर बीज क्रांति, 5 FPC के साथ शुरू किया उत्पादन

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बीज उत्पादन – फोटो : सोशल मीडिया

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हिमाचल प्रदेश में खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले 80 प्रतिशत बीज अन्य राज्यों से आते हैं। राज्य बीज प्रमाणन एजेंसी के 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार, यह निर्भरता प्राकृतिक खेती के विस्तार में बड़ी बाधा बन रही है। डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी ने प्राकृतिक खेती को मजबूत करने के लिए किसान उत्पादक कंपनियों (FPC) के माध्यम से स्थानीय बीज उत्पादन शुरू किया है। यह परियोजना बायोवर्सिटी इंटरनेशनल और CIAT द्वारा वित्त पोषित है।  

प्राकृतिक खेती जलवायु-अनुकूल, पर्यावरण-अनुकूल और कम लागत वाली प्रणाली के रूप में तेजी से उभर रही है। हिमाचल में 2.2 लाख से अधिक किसान इसे अपना चुके हैं। विश्वविद्यालय के शोध निदेशक डॉ. संजीव चौहान ने बताया कि रसायनों का उपयोग न करके स्थानीय संसाधनों पर निर्भरता ही इसकी ताकत है।  

परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. सुधीर वर्मा ने बताया कि पांच FPC को क्षेत्रीय फसलों के अनुसार जिम्मेदारी दी गई है। करसोग में अनाज, बाजरा और सब्जियों के बीज तैयार किए जाएंगे। चौपाल में अनाज, व सब्जियों, पच्छाद एवं सोलन में अनाज, सब्जियां, लहसुन व अदरक और सुंदरनगर में अनाज व सब्जियों के बीज तैयार किए जाएंगे। 

विश्वविद्यालय का वैज्ञानिक सहयोग
विश्वविद्यालय वैज्ञानिक बीज संग्रह, संरक्षण, गुणन और वितरण के लिए प्रोटोकॉल विकसित करेंगे। साथ ही आणविक और पोषण प्रोफाइलिंग भी की जाएगी।

बीज आत्मनिर्भरता क्यों जरूरी
डॉ. चौहान ने कहा, “प्राकृतिक खेती के बीजों की मांग आपूर्ति से कहीं अधिक है। बाहरी या रासायनिक बीजों का उपयोग प्राकृतिक खेती के उद्देश्य को कमजोर करता है। बीजों में आत्मनिर्भरता ही इसकी दीर्घकालिक सफलता की कुंजी है।”

विकेंद्रीकृत प्रणाली और सामुदायिक बैंक
FPC के माध्यम से विकेंद्रीकृत शासन को बढ़ावा दिया जाएगा। चयनित FPC में सामुदायिक बीज बैंक स्थापित किए जाएंगे। कम लागत वाली, जलवायु-अनुकूल भंडारण संरचना बनेगी। मिट्टी के घड़े, कोठार और डिब्बों जैसे पारंपरिक तरीकों को बेहतर वेंटिलेशन और लेबलिंग के साथ पुनर्जीवित किया जाएगा।  

कुलपति प्रो. राजेश्वर चंदेल ने कहा, “ यह पहल स्थानीय स्तर पर जलवायु-अनुकूल बीज सस्ते दामों पर उपलब्ध कराएगी, जिससे किसानों की महंगे हाइब्रिड बीजों पर पर निर्भरता कम होगी। पर्यावरणीय रूप से जैव विविधता बढ़ेगी, कार्बन फुटप्रिंट घटेगा। सामाजिक रूप से रोजगार बनेगा और पारंपरिक ज्ञान को सम्मान मिलेगा।”  

Farrukhabad SP कार्यालय में विजिलेंस की बड़ी कार्रवाई: वरिष्ठ लिपिक 15 हजार की रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार

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फर्रुखाबाद में पुलिस अधीक्षक कार्यालय के लेखा अनुभाग में तैनात एक वरिष्ठ लिपिक का रिश्वतखोरी मामला सामने आया है। लखनऊ से पहुंची विजिलेंस टीम ने उसे हेड कांस्टेबल से यात्रा और महंगाई भत्ता पास कराने के एवज में 15,000 रुपये लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। कार्रवाई इतनी अचानक हुई कि कार्यालय में हड़कंप मच गया।

विजिलेंस की योजना में यूं फंसा लिपिक

एसपी कार्यालय में तैनात हेड कांस्टेबल आदित्य कुमार पटेल का 1.45 लाख रुपये का यात्रा और महंगाई भत्ता काफी समय से लंबित था। आरोप है कि लेखा अनुभाग का वरिष्ठ लिपिक हरेंद्र सिंह चौहान भुगतान मंजूर करने के लिए 15 हजार रुपये की मांग कर रहा था। कई प्रयासों के बावजूद जब विभागीय प्रक्रिया नहीं बढ़ी, तो हेड कांस्टेबल ने उप्र सतर्कता अधिष्ठान के सीओ राजन कुमार रावत से शिकायत की।

शिकायत के आधार पर विजिलेंस की छह सदस्यीय टीम ने गुरुवार को एसपी कार्यालय का निरीक्षण किया और शुक्रवार को ट्रैप की योजना लागू की। तय रकम लेकर हेड कांस्टेबल हरेंद्र के पास पहुंचे। जैसे ही लिपिक ने रुपये लिए और गिनने लगा, तभी पीछे से विजिलेंस टीम ने पहुंचकर उसे पकड़ लिया।

गिरफ्तारी के बाद आरोपी को पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस ले जाया गया, जहां करीब तीन घंटे तक उससे पूछताछ की गई। इसके बाद विजिलेंस टीम उसे अपने साथ लखनऊ ले गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरोपी लिपिक मूल रूप से बुलंदशहर जनपद के खुर्जा का निवासी है और वर्तमान में उसका परिवार मेरठ के कृष्णा नगर में किराए के मकान में रह रहा है।

एसपी का बयान

एसपी आरती सिंह ने बताया कि विजिलेंस की कार्रवाई के बाद आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी। साथ ही उसे निलंबित कर विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी।