Tuesday, March 3, 2026
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भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: पशु आहार पर सीमित छूट, सोयाबीन तेल पर उद्योग की नजर

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भारत-अमेरिका डील में सूखा अनाज आधारित पशु आहार पर सिर्फ 5 लाख टन का कोटा दिया गया है। – फोटो : सोशल मीडिया

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भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के पहले चरण में कृषि और खाद्य तेल क्षेत्र से जुड़े प्रावधानों को लेकर तस्वीर धीरे-धीरे साफ हो रही है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका को सूखा अनाज आधारित पशु आहार (DDGS) पर दी गई रियायत बेहद सीमित है और इससे घरेलू किसानों या बाजार पर बड़े असर की आशंका नहीं है। हालांकि, सोयाबीन तेल और अन्य कृषि उत्पादों पर संभावित टैरिफ कटौती को लेकर उद्योग जगत अब भी विस्तृत दिशा-निर्देश का इंतजार कर रहा है।

पशु आहार पर सिर्फ 5 लाख टन का कोटा
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक भारत ने अमेरिका को DDGS यानी सूखा अनाज आधारित पशु आहार पर अधिकतम 5 लाख टन का ही कोटा दिया है। यह देश की कुल पशु आहार खपत का करीब एक फीसदी है। भारत में पशु चारे की सालाना खपत लगभग 500 लाख टन आंकी जाती है। सरकार का कहना है कि यह सीमित आयात घरेलू आपूर्ति में कमी की भरपाई करेगा, न कि बाजार में असंतुलन पैदा करेगा।

उद्योग जगत ने समझौते पर नजरें लगा रखी हैं। – फोटो : गांव जंक्शन

चारे की लागत और खाद्य महंगाई पर नियंत्रण की कोशिश
सरकार का तर्क है कि सीमित मात्रा में DDGS आयात से मक्का और सोयाबीन जैसे कच्चे माल पर दबाव घटेगा। इससे इंसानों के उपभोग योग्य अनाज को पशु चारे में इस्तेमाल करने की मजबूरी कम होगी। पोल्ट्री, डेयरी, एक्वाकल्चर और पशुपालन जैसे क्षेत्रों में लागत स्थिर रहने की उम्मीद जताई जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, इसका असर खाद्य मुद्रास्फीति को काबू में रखने में भी सहायक हो सकता है।
 

अमेरिका को सूखे पशु चारे (डीडीजीएस) पर सिर्फ 5 लाख टन कोटा। – फोटो : गांव जंक्शन

बढ़ती मांग ने पहले भी बढ़ाया आयात
पिछले कुछ वर्षों में पशु आहार की मांग तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2021 में घरेलू कीमतों में उछाल के कारण भारत को करीब 15 लाख टन सोयाबीन मील का आयात करना पड़ा था। इसके अलावा 6 लाख टन से अधिक पशु आहार श्रीलंका, चीन, अमेरिका, थाईलैंड और नेपाल जैसे देशों से मंगाया गया। म्यांमार, यूक्रेन, सिंगापुर और यूएई से मक्का, जबकि कुछ अफ्रीकी देशों से सोयाबीन का भी आयात हुआ है।

पशु चारे की मांग बढ़ने के कारण जरूरी हो जाता है आयात। – फोटो : गांव जंक्शन

सोयाबीन तेल पर उद्योग की नजर, लेकिन सतर्कता बरकरार
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के मसौदे को खाद्य तेल और सोयाबीन प्रसंस्करण उद्योग ने सतर्क आशावाद के साथ देखा है। प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिका भारतीय उत्पादों पर शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमत है। इसके बदले भारत अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं, सोयाबीन तेल, पशु आहार, अखरोट और कुछ फलों पर शुल्क घटाने या हटाने पर विचार कर रहा है।

कीमत, कोटा और जीएम उत्पादों पर सवाल
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का कहना है कि भारत पहले से ही सोयाबीन तेल के आयात पर काफी निर्भर है, ऐसे में यह समझौता अवसर भी बन सकता है। फिलहाल अमेरिका से आने वाला सोयाबीन तेल ऊंचे शुल्क के कारण महंगा पड़ता है और अर्जेंटीना की तुलना में 30-40 डॉलर प्रति टन ज्यादा कीमत पर आता है। हालांकि, उद्योग संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया है कि जेनेटिकली मोडिफाइड (GM) और नॉन-GM उत्पादों को लेकर सरकार का रुख अभी साफ नहीं है। टैरिफ कटौती, कोटा व्यवस्था और गुणवत्ता मानकों पर अंतिम दिशा-निर्देश सामने आने के बाद ही उद्योग कोई ठोस निष्कर्ष निकाल पाएगा।

CM योगी ने फील्ड अफसरों को दिए दिशा-निर्देश, पर्व-त्योहार और बोर्ड परीक्षाओं में सुरक्षा पर जोर

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से फील्ड अफसरों को दिशा-निर्देश दिए। इस दौरान उन्होंने कहा कि पर्व-त्योहार उल्लास और भाईचारे का प्रतीक होते हैं, न कि किसी को आहत करने का माध्यम। उन्होंने अफसरों को स्पष्ट किया कि होली, रमजान, ईद और नवरात्र जैसे पर्व-त्योहार शांति और सौहार्दपूर्ण माहौल में मनाए जाएं।

सीएम ने कहा ये

मुख्यमंत्री ने लापरवाही पर गाजियाबाद पुलिस को फटकार लगाई और सभी जिलों के अधिकारियों को हिदायत दी कि उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई ऐसी हो जो नजीर बने। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था की निगरानी कड़ी रहे, और त्योहारों और बोर्ड परीक्षाओं के मद्देनजर सभी जिलों में सतर्कता बढ़ाई जाए।

CM योगी ने पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ाने, शोभायात्राओं में सतर्कता रखने और साफ-सफाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। साथ ही उन्होंने कहा कि कानफोड़ू लाउडस्पीकर हटाए जाएं और ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए संवाद का उपयोग किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि अभद्र गीत-संगीत नहीं बजना चाहिए और किसी भी उत्साह में ऐसा काम न किया जाए जिससे अन्य किसी को आहत हो।

मुख्यमंत्री ने प्रदेशभर में निर्बाध बिजली सुनिश्चित करने पर जोर दिया और कहा कि पर्व-त्योहार के समय पर्याप्त पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं का इंतजाम किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने होली के दौरान बढ़े आवागमन को देखते हुए अतिरिक्त बसें चलाने और मनमाना किराया वसूलने वालों पर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए।

जनसुनवाई को प्रभावी बनाने का निर्देश

CM योगी ने जनसुनवाई व्यवस्था को और प्रभावी बनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने अधिकारियों को कहा कि वे जनसमस्याओं के प्रति संवेदनशील रहें और जनता के मुद्दों को प्राथमिकता से हल करें। इस VC मीटिंग में सभी फील्ड अफसरों को स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल गए हैं, जिससे त्योहारों और परीक्षाओं के दौरान प्रदेश में शांति और सुव्यवस्था बनी रहे।

राज्य भर में HPV वैक्सीनेशन अभियान शुरू

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महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम का कैंपेन शुरू किया गया है, जहाँ तीन महीने के समय में लगभग 9.84 लाख 14 साल की लड़कियों को वैक्सीन लगाई जानी है। इस ड्राइव से राज्य ने देश भर में ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) इम्यूनाइज़ेशन प्रोग्राम में ऑफिशियली हिस्सा लिया है, जिसके बाद इस वैक्सीन को रेगुलर इम्यूनाइज़ेशन सर्विस में शामिल किया जाएगा।(Statewide HPV Vaccination Drive Launched Targeting Over 9 Lakh Adolescent Girls)

क्वाड्रीवैलेंट वैक्सीन गार्डासिल-4 की लगभग 9,47,380 डोज़ खरीदी

राजस्थान के अजमेर में प्रधानमंत्री द्वारा नेशनल लॉन्च से पहले, राज्य ने क्वाड्रीवैलेंट वैक्सीन गार्डासिल-4 की लगभग 9,47,380 डोज़ खरीदी थीं। इस वैक्सीन के ज़रिए चार HPV स्ट्रेन से सुरक्षा पक्की की गई है, जिसमें टाइप 16 और 18 शामिल हैं, जो दुनिया भर में सर्वाइकल कैंसर के लगभग 70 परसेंट मामलों से जुड़े हैं। डोज़ को पुणे में स्टेट वैक्सीन डिपो में +2°C और +8°C के बीच सख्त कोल्ड चेन कंडीशन में स्टोर किया गया है। यह पक्का करने के लिए वैक्सीन वायल मॉनिटर लगाए गए हैं कि असर बना रहे और ज़्यादा गर्मी न लगे।

एलिजिबिलिटी सिर्फ़ उन लड़कियों तक सीमित है जिनकी उम्र 14 साल पूरी लेकिन अभी 15 साल की नहीं

एलिजिबिलिटी सिर्फ़ उन लड़कियों तक सीमित है जिनकी उम्र 14 साल पूरी हो गई है लेकिन अभी 15 साल की नहीं हुई हैं। एक 0.5 ml डोज़ बाईं बांह के ऊपरी हिस्से में इंट्रामस्क्युलर तरीके से दी जाएगी। पहचान के लिए, बाईं छोटी उंगली के नाखून पर एक निशान लगाया जाएगा। इसमें हिस्सा लेना अपनी मर्ज़ी से किया जाएगा, और माता-पिता की मंज़ूरी ज़रूरी कर दी गई है।

प्राइमरी हेल्थ सेंटर, ग्रामीण अस्पतालों, ज़िला और क्षेत्रीय अस्पतालों, नगर निगम की सुविधाओं और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में मिलेगा डोज

वैक्सीनेशन सर्विस पूरे राज्य में प्राइमरी हेल्थ सेंटर, ग्रामीण अस्पतालों, ज़िला और क्षेत्रीय अस्पतालों, नगर निगम की सुविधाओं और सरकारी मेडिकल कॉलेजों के ज़रिए दी जाएंगी। सरकार के U-WIN पोर्टल के ज़रिए डिजिटल रजिस्ट्रेशन और सर्टिफ़िकेशन प्रोसेस को आसान बनाया गया है, जहाँ माता-पिता OTP-बेस्ड मंज़ूरी दे सकते हैं। जिन इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी कम है, वहाँ फ़िज़िकल मंज़ूरी फ़ॉर्म स्वीकार किए जाएँगे।

तीन महीने में कैंपेन पूरा होने की संभावना 

तीन महीने का कैंपेन पूरा होने पर, HPV वैक्सीनेशन को पूरे साल रेगुलर इम्यूनाइज़ेशन दिनों में शामिल किया जाएगा। इस पहल को बेटियों के भविष्य की सुरक्षा पर ज़ोर देने वाले नारे के तहत प्रमोट किया गया है, और महाराष्ट्र में इसका एक सेरेमोनियल लॉन्च मुंबई के B.Y.L. नायर हॉस्पिटल में तय किया गया है, जहाँ राज्य के हेल्थ अधिकारियों की मौजूदगी में वैक्सीनेशन किया जाएगा।

यह भी पढ़ें – महाराष्ट्र MCA CET 2026- एप्लीकेशन फॉर्म में सुधार करने का आखिरी मौका 28 फरवरी तक

चने की फसल पर रोगों का साया : उकठा और जड़ सड़न से फसल बचाने के लिए विशेषज्ञों ने जारी किए जरूरी सुझाव

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चना की फसल में कई रोगों के प्रकोप का खतरा।

चना की फसल में कई रोगों के प्रकोप का खतरा।
– फोटो : AI Image

विस्तार


देश की प्रमुख दलहनी फसल चने की खेती करने वाले किसानों के लिए यह समय बहुत सावधानी बरतने का है। विशेषज्ञों के अनुसार, चने की फसल में कई तरह के रोगों के संक्रमण का खतरा बना रहता है, जो पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है। चने की फसल में मिट्टी जनित रोगों के फैलने का सबसे बड़ा कारण फसल चक्र की अनदेखी करना है। अक्सर देखा गया है कि किसान एक ही खेत में लगातार चने की फसल लेते हैं, जिससे मिट्टी में मौजूद रोगों का प्रभाव बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए खेती के जानकारों ने कुछ विशेष प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने की सलाह दी है।फसल चक्र और गहरी जुताई से मिटेंगे रोगों के बीजाणु
मिट्टी जनित रोगों से निपटने के लिए सबसे कारगर तरीका खेत की तैयारी के समय ही शुरू हो जाता है। जानकारों का कहना है कि किसानों को गर्मियों के दौरान खेत की गहरी जुताई जरूर करनी चाहिए। ऐसा करने से पुरानी फसल के अवशेषों में छिपे कीट और फफूंद के बीजाणु सीधे सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही फसल को रोगों से बचाने के लिए फसल चक्र अपनाना बेहद जरूरी है। यदि किसान हर दूसरे साल चने की जगह अलग-अलग रबी फसलों की बुवाई करें, तो मिट्टी जनित रोगों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उकठा रोग के लिए ट्राइकोडर्मा और बीज उपचार का नुस्खा
चने की फसल में उकठा रोग का संक्रमण काफी घातक होता है। इसकी रोकथाम के लिए विशेषज्ञों ने जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों के मेल का सुझाव दिया है। किसान सिंचाई से पहले 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में 10 किलो ट्राइकोडर्मा मिलाकर एक हेक्टेयर खेत में समान रूप से फैला सकते हैं। इसके अलावा बीज उपचार को सुरक्षा कवच की तरह अपनाना चाहिए। बीजों को कार्बेन्डाजिम की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने पर मिट्टी जनित रोगों से सुरक्षा मिलती है। विशेषज्ञों ने ‘पूसा चना मानव’ जैसी प्रतिरोधी किस्में अपनाने पर जोर दिया है, जिसकी औसत उपज 2.5 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है।

जड़ और तना गलन से बचाव के लिए प्रबंधन है जरूरी
चने में जड़ सड़न और तना गलन जैसे रोग भी पौधों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इन रोगों में पौधों की जड़ें गलने लगती हैं और पौधा सूख जाता है। जानकारों के अनुसार, तना गलन का खतरा अधिक नमी और ऊंचे तापमान में बढ़ जाता है। इससे बचाव के लिए खेत में फसल के अवशेष बिल्कुल न छोड़ें और संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर जला दें। रासायनिक उपचार के तौर पर कार्बेन्डाजिम का 0.2% घोल बनाकर पौधों की जड़ों के पास छिड़काव करना प्रभावी रहता है। वहीं तना गलन के मामले में बुवाई के 50-60 दिन बाद कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

अंगमारी रोग और जल निकासी पर ध्यान दें
ठंडे इलाकों में अक्सर चने की फसल में अंगमारी रोग देखा जाता है, जो फफूंद के कारण फैलता है। इससे बचने के लिए किसान ‘पूसा 3022’ जैसी उन्नत प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। बुवाई से पहले कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब से बीज उपचारित करना और संक्रमण दिखने पर कार्बेन्डाजिम के घोल का छिड़काव करना फायदेमंद रहता है। अंत में, विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि खेती के दौरान मिट्टी में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि खेत में जरूरत से ज्यादा नमी रोगों को न्योता देती है। इन सावधानियों को अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं।

चने की फसल पर रोगों का साया : उकठा और जड़ सड़न से फसल बचाने के लिए विशेषज्ञों ने जारी किए जरूरी सुझाव

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चना की फसल में कई रोगों के प्रकोप का खतरा।

चना की फसल में कई रोगों के प्रकोप का खतरा।
– फोटो : AI Image

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देश की प्रमुख दलहनी फसल चने की खेती करने वाले किसानों के लिए यह समय बहुत सावधानी बरतने का है। विशेषज्ञों के अनुसार, चने की फसल में कई तरह के रोगों के संक्रमण का खतरा बना रहता है, जो पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है। चने की फसल में मिट्टी जनित रोगों के फैलने का सबसे बड़ा कारण फसल चक्र की अनदेखी करना है। अक्सर देखा गया है कि किसान एक ही खेत में लगातार चने की फसल लेते हैं, जिससे मिट्टी में मौजूद रोगों का प्रभाव बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए खेती के जानकारों ने कुछ विशेष प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने की सलाह दी है।फसल चक्र और गहरी जुताई से मिटेंगे रोगों के बीजाणु
मिट्टी जनित रोगों से निपटने के लिए सबसे कारगर तरीका खेत की तैयारी के समय ही शुरू हो जाता है। जानकारों का कहना है कि किसानों को गर्मियों के दौरान खेत की गहरी जुताई जरूर करनी चाहिए। ऐसा करने से पुरानी फसल के अवशेषों में छिपे कीट और फफूंद के बीजाणु सीधे सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही फसल को रोगों से बचाने के लिए फसल चक्र अपनाना बेहद जरूरी है। यदि किसान हर दूसरे साल चने की जगह अलग-अलग रबी फसलों की बुवाई करें, तो मिट्टी जनित रोगों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उकठा रोग के लिए ट्राइकोडर्मा और बीज उपचार का नुस्खा
चने की फसल में उकठा रोग का संक्रमण काफी घातक होता है। इसकी रोकथाम के लिए विशेषज्ञों ने जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों के मेल का सुझाव दिया है। किसान सिंचाई से पहले 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में 10 किलो ट्राइकोडर्मा मिलाकर एक हेक्टेयर खेत में समान रूप से फैला सकते हैं। इसके अलावा बीज उपचार को सुरक्षा कवच की तरह अपनाना चाहिए। बीजों को कार्बेन्डाजिम की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने पर मिट्टी जनित रोगों से सुरक्षा मिलती है। विशेषज्ञों ने ‘पूसा चना मानव’ जैसी प्रतिरोधी किस्में अपनाने पर जोर दिया है, जिसकी औसत उपज 2.5 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है।

जड़ और तना गलन से बचाव के लिए प्रबंधन है जरूरी
चने में जड़ सड़न और तना गलन जैसे रोग भी पौधों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इन रोगों में पौधों की जड़ें गलने लगती हैं और पौधा सूख जाता है। जानकारों के अनुसार, तना गलन का खतरा अधिक नमी और ऊंचे तापमान में बढ़ जाता है। इससे बचाव के लिए खेत में फसल के अवशेष बिल्कुल न छोड़ें और संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर जला दें। रासायनिक उपचार के तौर पर कार्बेन्डाजिम का 0.2% घोल बनाकर पौधों की जड़ों के पास छिड़काव करना प्रभावी रहता है। वहीं तना गलन के मामले में बुवाई के 50-60 दिन बाद कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

अंगमारी रोग और जल निकासी पर ध्यान दें
ठंडे इलाकों में अक्सर चने की फसल में अंगमारी रोग देखा जाता है, जो फफूंद के कारण फैलता है। इससे बचने के लिए किसान ‘पूसा 3022’ जैसी उन्नत प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। बुवाई से पहले कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब से बीज उपचारित करना और संक्रमण दिखने पर कार्बेन्डाजिम के घोल का छिड़काव करना फायदेमंद रहता है। अंत में, विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि खेती के दौरान मिट्टी में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि खेत में जरूरत से ज्यादा नमी रोगों को न्योता देती है। इन सावधानियों को अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं।

चने की फसल पर रोगों का साया : उकठा और जड़ सड़न से फसल बचाने के लिए विशेषज्ञों ने जारी किए जरूरी सुझाव

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चना की फसल में कई रोगों के प्रकोप का खतरा।

चना की फसल में कई रोगों के प्रकोप का खतरा।
– फोटो : AI Image

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देश की प्रमुख दलहनी फसल चने की खेती करने वाले किसानों के लिए यह समय बहुत सावधानी बरतने का है। विशेषज्ञों के अनुसार, चने की फसल में कई तरह के रोगों के संक्रमण का खतरा बना रहता है, जो पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है। चने की फसल में मिट्टी जनित रोगों के फैलने का सबसे बड़ा कारण फसल चक्र की अनदेखी करना है। अक्सर देखा गया है कि किसान एक ही खेत में लगातार चने की फसल लेते हैं, जिससे मिट्टी में मौजूद रोगों का प्रभाव बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए खेती के जानकारों ने कुछ विशेष प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने की सलाह दी है।फसल चक्र और गहरी जुताई से मिटेंगे रोगों के बीजाणु
मिट्टी जनित रोगों से निपटने के लिए सबसे कारगर तरीका खेत की तैयारी के समय ही शुरू हो जाता है। जानकारों का कहना है कि किसानों को गर्मियों के दौरान खेत की गहरी जुताई जरूर करनी चाहिए। ऐसा करने से पुरानी फसल के अवशेषों में छिपे कीट और फफूंद के बीजाणु सीधे सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही फसल को रोगों से बचाने के लिए फसल चक्र अपनाना बेहद जरूरी है। यदि किसान हर दूसरे साल चने की जगह अलग-अलग रबी फसलों की बुवाई करें, तो मिट्टी जनित रोगों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उकठा रोग के लिए ट्राइकोडर्मा और बीज उपचार का नुस्खा
चने की फसल में उकठा रोग का संक्रमण काफी घातक होता है। इसकी रोकथाम के लिए विशेषज्ञों ने जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों के मेल का सुझाव दिया है। किसान सिंचाई से पहले 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में 10 किलो ट्राइकोडर्मा मिलाकर एक हेक्टेयर खेत में समान रूप से फैला सकते हैं। इसके अलावा बीज उपचार को सुरक्षा कवच की तरह अपनाना चाहिए। बीजों को कार्बेन्डाजिम की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने पर मिट्टी जनित रोगों से सुरक्षा मिलती है। विशेषज्ञों ने ‘पूसा चना मानव’ जैसी प्रतिरोधी किस्में अपनाने पर जोर दिया है, जिसकी औसत उपज 2.5 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है।

जड़ और तना गलन से बचाव के लिए प्रबंधन है जरूरी
चने में जड़ सड़न और तना गलन जैसे रोग भी पौधों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इन रोगों में पौधों की जड़ें गलने लगती हैं और पौधा सूख जाता है। जानकारों के अनुसार, तना गलन का खतरा अधिक नमी और ऊंचे तापमान में बढ़ जाता है। इससे बचाव के लिए खेत में फसल के अवशेष बिल्कुल न छोड़ें और संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर जला दें। रासायनिक उपचार के तौर पर कार्बेन्डाजिम का 0.2% घोल बनाकर पौधों की जड़ों के पास छिड़काव करना प्रभावी रहता है। वहीं तना गलन के मामले में बुवाई के 50-60 दिन बाद कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

अंगमारी रोग और जल निकासी पर ध्यान दें
ठंडे इलाकों में अक्सर चने की फसल में अंगमारी रोग देखा जाता है, जो फफूंद के कारण फैलता है। इससे बचने के लिए किसान ‘पूसा 3022’ जैसी उन्नत प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। बुवाई से पहले कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब से बीज उपचारित करना और संक्रमण दिखने पर कार्बेन्डाजिम के घोल का छिड़काव करना फायदेमंद रहता है। अंत में, विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि खेती के दौरान मिट्टी में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि खेत में जरूरत से ज्यादा नमी रोगों को न्योता देती है। इन सावधानियों को अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं।

9 करोड़ लोन केस में राजपाल यादव का बड़ा खुलासा, 1200 करोड़ के प्रोजेक्ट और 10 फिल्में लाइनअप

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मुंबई. 9 करोड़ रुपये के लोन और चेक बाउंस मामले में कानूनी उलझनों का सामना कर रहे अभिनेता-हास्य कलाकार राजपाल यादव ने शनिवार को मुंबई में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी चुप्पी तोड़ी. अपने वकील भास्कर उपाध्याय के साथ मीडिया के सामने आए राजपाल यादव ने न केवल चल रहे केस पर अपनी स्थिति स्पष्ट की, बल्कि आने वाले वर्षों की अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं का भी खुलासा किया. अभिनेता ने दावा किया कि उनके पास अगले सात वर्षों के लिए 1200 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के ब्रांडिंग और अन्य प्रोजेक्ट्स लाइनअप हैं, साथ ही 10 फिल्में भी कतार में हैं.

प्रेस वार्ता के दौरान राजपाल यादव ने कहा कि पिछले एक दशक ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है और वे इस पूरे अनुभव को जीवन का बड़ा सबक मानते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे कानूनी प्रक्रिया का पूरा सम्मान करते हैं और अदालत के निर्देशों का पालन कर रहे हैं. अभिनेता ने बताया कि उनके खिलाफ चल रहे 9 करोड़ रुपये के मामले में हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट से उन्हें अंतरिम राहत मिली है. अदालत ने 18 मार्च तक उनकी सजा पर अस्थायी रोक लगाई है और उन्हें एक लाख रुपये के निजी मुचलके तथा इतनी ही राशि के एक जमानती बांड पर राहत प्रदान की है. न्यायालय ने यह भी नोट किया कि प्रतिवादी के बैंक खाते में 1.5 करोड़ रुपये जमा कराए जा चुके हैं.

राजपाल यादव ने अपने भविष्य के काम को लेकर बड़ा दावा करते हुए कहा कि अगले सात वर्षों में उनके ब्रांडिंग प्रोजेक्ट्स की कुल वैल्यू 1200 करोड़ रुपये तक पहुंचती है. उन्होंने बताया कि चार बड़े एग्रीमेंट साइन किए जा चुके हैं, जिनमें फिल्में शामिल नहीं हैं. कुछ प्रोजेक्ट्स की कीमत 200 करोड़ रुपये के आसपास है, जबकि कुछ का स्केल 2000 करोड़ रुपये तक का है. आय का मॉडल फीस और इक्विटी दोनों का मिश्रण होगा. इसके अलावा वे 10 फिल्मों में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिनकी शूटिंग अलग-अलग चरणों में शुरू होगी. उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाला समय उनके करियर के लिए नया मोड़ साबित होगा.

मीडिया से बातचीत में अभिनेता ने जेल के दौरान मिले समर्थन का भी जिक्र किया. उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि पिछले 20 दिनों में उन्हें देशभर से अप्रत्याशित सहयोग मिला. बच्चों की गुल्लक से लेकर सोशल मीडिया के माध्यम से एक करोड़ रुपये तक की सहायता उन्हें प्राप्त हुई. उन्होंने कहा कि वे सभी सहयोगकर्ताओं का सार्वजनिक रूप से धन्यवाद करेंगे और कुछ लोगों का नाम लेकर विशेष आभार व्यक्त करना चाहते हैं, जबकि कई लोग गुमनाम रहना चाहते हैं. राजपाल यादव ने कहा कि वे सभी का पैसा सम्मानपूर्वक लौटाना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें थोड़ा समय चाहिए. हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि देशभर के उन बच्चों का कर्ज वे कभी नहीं चुका पाएंगे, जिन्होंने कठिन समय में उनका साथ दिया.

गौरतलब है कि राजपाल यादव का नाम पहले भी वित्तीय विवादों के कारण सुर्खियों में रहा है. चेक बाउंस मामले में सजा सुनाए जाने के बाद वे कुछ समय के लिए जेल भी गए थे. हालिया अंतरिम राहत के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी है और यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे कानूनी दायित्वों से पीछे हटने वाले नहीं हैं. अभिनेता ने कहा कि वे हर बकाया राशि का भुगतान करेंगे और अपने पेशेवर जीवन को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाएंगे.

फिल्म उद्योग के जानकारों का मानना है कि राजपाल यादव की लोकप्रियता आज भी बरकरार है. ‘भूल भुलैया’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में उनके हास्य अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा है. ऐसे में यदि उनके दावे के मुताबिक बड़े प्रोजेक्ट्स मूर्त रूप लेते हैं तो यह उनके करियर की दूसरी पारी साबित हो सकती है. हालांकि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं होगी.

फिलहाल अभिनेता का कहना है कि वे सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं और अपने प्रशंसकों का विश्वास बनाए रखना चाहते हैं. उन्होंने मीडिया से अपील की कि मामले को तथ्यों के आधार पर देखा जाए और अफवाहों से बचा जाए. आने वाले दिनों में अदालत में अगली सुनवाई और उनके नए प्रोजेक्ट्स की औपचारिक घोषणाओं पर सबकी नजर रहेगी.

बरेली: सीबीगंज में सिपाही मनोज मौर्य की संदिग्ध मौत, गले पर निशान मिलने से मचा हड़कंप

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बरेली के सीबीगंज इलाके में तैनात सिपाही मनोज मौर्य (37) की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। हाल ही में ट्रांसफर होकर नए घर में शिफ्ट हुए सिपाही की मौत से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। गले पर निशान और शरीर पर खरोंच मिलने से मामला और भी संदिग्ध हो गया है। पुलिस ने शव पोस्टमॉर्टम के लिए भेजकर जांच शुरू कर दी है।

ये है मामला 

सीबीगंज के मोहल्ला लेवर कॉलोनी के मूल निवासी मनोज मौर्य वर्तमान में कैम्फर स्टेट कॉलोनी स्थित अपने मकान में रह रहे थे। एक सप्ताह पहले ही उन्होंने नए घर में गृहप्रवेश किया था। इससे पहले वह किराये के मकान में रहते थे और इन दिनों घर का सामान शिफ्ट करा रहे थे।

मनोज की तैनाती पहले अमरोहा में थी। करीब एक सप्ताह पूर्व उनका ट्रांसफर मुरादाबाद हुआ था, हालांकि अभी उन्होंने वहां आमद दर्ज नहीं कराई थी।

बताया जा रहा है कि शुक्रवार शाम किसी बात को लेकर उनकी पत्नी ज्योति उर्फ मीनू से कहासुनी हो गई थी। इसके बाद पत्नी ने देवर और जेठ को सूचना दी कि मनोज को हार्ट अटैक पड़ा है। सूचना मिलते ही परिजन कैम्फर स्टेट कॉलोनी पहुंचे, जहां मनोज अचेत अवस्था में मिले। उन्हें तुरंत शहर के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

परिजनों ने कहा ये

परिजनों के अनुसार, मनोज की जीभ बाहर निकली हुई थी और गले पर रस्सी जैसे निशान थे। शरीर पर नाखून की खरोंच के निशान भी बताए गए हैं। मृतक के परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी और एक बेटा है।

थाना पुलिस ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है। पुलिस का कहना है कि मौत के सही कारणों का खुलासा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगा।

चने की फसल पर रोगों का साया : उकठा और जड़ सड़न से फसल बचाने के लिए विशेषज्ञों ने जारी किए जरूरी सुझाव

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चना की फसल में कई रोगों के प्रकोप का खतरा।

चना की फसल में कई रोगों के प्रकोप का खतरा।
– फोटो : AI Image

विस्तार


देश की प्रमुख दलहनी फसल चने की खेती करने वाले किसानों के लिए यह समय बहुत सावधानी बरतने का है। विशेषज्ञों के अनुसार, चने की फसल में कई तरह के रोगों के संक्रमण का खतरा बना रहता है, जो पूरी मेहनत पर पानी फेर सकता है। चने की फसल में मिट्टी जनित रोगों के फैलने का सबसे बड़ा कारण फसल चक्र की अनदेखी करना है। अक्सर देखा गया है कि किसान एक ही खेत में लगातार चने की फसल लेते हैं, जिससे मिट्टी में मौजूद रोगों का प्रभाव बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए खेती के जानकारों ने कुछ विशेष प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने की सलाह दी है।फसल चक्र और गहरी जुताई से मिटेंगे रोगों के बीजाणु
मिट्टी जनित रोगों से निपटने के लिए सबसे कारगर तरीका खेत की तैयारी के समय ही शुरू हो जाता है। जानकारों का कहना है कि किसानों को गर्मियों के दौरान खेत की गहरी जुताई जरूर करनी चाहिए। ऐसा करने से पुरानी फसल के अवशेषों में छिपे कीट और फफूंद के बीजाणु सीधे सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही फसल को रोगों से बचाने के लिए फसल चक्र अपनाना बेहद जरूरी है। यदि किसान हर दूसरे साल चने की जगह अलग-अलग रबी फसलों की बुवाई करें, तो मिट्टी जनित रोगों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उकठा रोग के लिए ट्राइकोडर्मा और बीज उपचार का नुस्खा
चने की फसल में उकठा रोग का संक्रमण काफी घातक होता है। इसकी रोकथाम के लिए विशेषज्ञों ने जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों के मेल का सुझाव दिया है। किसान सिंचाई से पहले 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में 10 किलो ट्राइकोडर्मा मिलाकर एक हेक्टेयर खेत में समान रूप से फैला सकते हैं। इसके अलावा बीज उपचार को सुरक्षा कवच की तरह अपनाना चाहिए। बीजों को कार्बेन्डाजिम की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने पर मिट्टी जनित रोगों से सुरक्षा मिलती है। विशेषज्ञों ने ‘पूसा चना मानव’ जैसी प्रतिरोधी किस्में अपनाने पर जोर दिया है, जिसकी औसत उपज 2.5 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है।

जड़ और तना गलन से बचाव के लिए प्रबंधन है जरूरी
चने में जड़ सड़न और तना गलन जैसे रोग भी पौधों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इन रोगों में पौधों की जड़ें गलने लगती हैं और पौधा सूख जाता है। जानकारों के अनुसार, तना गलन का खतरा अधिक नमी और ऊंचे तापमान में बढ़ जाता है। इससे बचाव के लिए खेत में फसल के अवशेष बिल्कुल न छोड़ें और संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर खेत से बाहर जला दें। रासायनिक उपचार के तौर पर कार्बेन्डाजिम का 0.2% घोल बनाकर पौधों की जड़ों के पास छिड़काव करना प्रभावी रहता है। वहीं तना गलन के मामले में बुवाई के 50-60 दिन बाद कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

अंगमारी रोग और जल निकासी पर ध्यान दें
ठंडे इलाकों में अक्सर चने की फसल में अंगमारी रोग देखा जाता है, जो फफूंद के कारण फैलता है। इससे बचने के लिए किसान ‘पूसा 3022’ जैसी उन्नत प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। बुवाई से पहले कार्बेन्डाजिम और मैन्कोजेब से बीज उपचारित करना और संक्रमण दिखने पर कार्बेन्डाजिम के घोल का छिड़काव करना फायदेमंद रहता है। अंत में, विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि खेती के दौरान मिट्टी में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि खेत में जरूरत से ज्यादा नमी रोगों को न्योता देती है। इन सावधानियों को अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं।

त्योहार सुरक्षित बनाने को सीएम योगी की सख्ती, पूरे प्रदेश में चलेगा चेकिंग अभियान

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उत्तर प्रदेश में आगामी त्योहारों को देखते हुए कानून-व्यवस्था और यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद मोर्चा संभाल लिया है। मुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (डीएम), पुलिस अधीक्षकों (एसपी) और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि त्योहारों के दौरान फील्ड में सक्रिय मौजूदगी सुनिश्चित की जाए, ताकि किसी भी तरह की अव्यवस्था या दुर्घटना की स्थिति उत्पन्न न हो।

डीएम और पुलिस अफसरों को दिए निर्देश 

मुख्यमंत्री ने निर्देशित किया कि त्योहारों के दौरान भीड़भाड़, बाजारों और धार्मिक स्थलों पर विशेष सतर्कता बरती जाए। पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीमें लगातार पेट्रोलिंग करें और संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त निगरानी रखी जाए। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसमें किसी भी स्तर पर लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

यातायात व्यवस्था को लेकर भी सीएम योगी ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि नियमित वाहन चेकिंग अभियान चलाया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना सीट बेल्ट और हेलमेट के कोई भी वाहन चालक सड़क पर न चले। इसके साथ ही शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ विशेष अभियान चलाकर कड़ी कार्रवाई करने के आदेश दिए गए हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि त्योहार खुशियों और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक होते हैं, इसलिए प्रशासन का दायित्व है कि आमजन सुरक्षित वातावरण में उत्सव मना सकें। इसके लिए ट्रैफिक प्रबंधन, भीड़ नियंत्रण, आपातकालीन सेवाओं और पुलिस रिस्पॉन्स सिस्टम को पूरी तरह अलर्ट मोड में रखा जाए।

राज्य सरकार ने दिए निर्देश 

राज्य सरकार ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि किसी भी घटना या समस्या की सूचना पर तुरंत कार्रवाई की जाए और जनता को अनावश्यक परेशानी न होने दी जाए। शासन स्तर से लगातार मॉनिटरिंग की जाएगी, जिससे प्रदेश में त्योहार शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल में संपन्न हो सकें।