Explained: भारत को चाहिए पुनर्योजी कृषि मिशन, मिट्टी, खाद्य सुरक्षा और किसानों के भविष्य की नई दिशा तय होगी – India Needs A Regenerative Agriculture Mission To Secure The Future Of Food, Farmers, And The Planet

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मिट्टी की सेहत

मिट्टी की सेहत
– फोटो : Ai

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विश्व खाद्य दिवस (World Food Day) के अवसर पर जब पूरी दुनिया “बेहतर भोजन और बेहतर भविष्य के लिए साथ मिलकर” का संदेश दे रही है, तब भारत के लिए यह समय है कि वह पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture) को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाए। यह एक ऐसी कृषि पद्धति है जो प्रकृति के साथ मिलकर काम करती है, न कि उसके विरुद्ध। इसका उद्देश्य मिट्टी की सेहत और उर्वरता को बहाल करना है, जिससे मिट्टी को क्षरण से बचाया जा सके और जैव विविधता को बढ़ाया जा सके। इसमें जैविक और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और पानी के संरक्षण जैसे तरीके अपनाए जाते हैं, ताकि पर्यावरण और भविष्य दोनों के लिए एक टिकाऊ और उत्पादक कृषि प्रणाली बनाई जा सके। पूरी पृथ्वी प्रभावित

आज मानवता जिस तेजी से पृथ्वी के संसाधनों का दोहन कर रही है, वह अस्थिर विकास की ओर इशारा करता है। पृथ्वी की कुल सतह का मात्र 10.7% हिस्सा ही खेती योग्य है, और यह लगातार प्रदूषण, रासायनिक अति-उपयोग और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहा है। भारत के पास विश्व में सबसे अधिक 52% कृषि योग्य भूमि है, लेकिन बढ़ती आबादी और असंतुलित खेती ने मिट्टी की उर्वरता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

भारत की कृषि पर बढ़ता दबाव

देश की 46% कार्यबल खेती पर निर्भर है, लेकिन अब यह क्षेत्र पर्यावरणीय और आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है। मिट्टी में कार्बन की मात्रा 0.3% से भी कम रह गई है, जबकि विशेषज्ञ रतन लाल और आर.एस. परोड़ा के अनुसार यह कम से कम 1% होनी चाहिए। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्यों की मिट्टियां अब “आईसीयू में भर्ती रोगी” की तरह कमजोर हो चुकी हैं।

यह स्थिति बताती है कि मिट्टी का पुनर्जीवन कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। इसके लिए एक राष्ट्रीय पुनर्योजी कृषि मिशन (National Mission on Regenerative Agriculture) की जरूरत है, जो वैज्ञानिक नवाचार, नीति सुधार और किसानों की सक्रिय भागीदारी के जरिए इस संकट को अवसर में बदल सके।

‘4 P’ का मॉडल: नीतियां, उत्पाद, प्रक्रियाएं और साझेदारी

भारत की कृषि यात्रा ने पहले भी यह साबित किया है कि जब नीतियां (Policies), उत्पाद (Products), प्रक्रियाएं (Practices) और साझेदारी (Partnerships) साथ आती हैं, तो बड़ा बदलाव संभव होता है।

1960 के दशक में भारत ने हरित क्रांति (Green Revolution) के जरिए खाद्य आत्मनिर्भरता हासिल की थी। नॉर्मन बोरलॉग, हेनरी बीचल, और गुरदेव खुराना जैसे वैज्ञानिकों के नेतृत्व में उच्च उपज वाली गेहूं और धान की किस्मों ने देश को अकाल से बचाया।

हालांकि, यही क्रांति अब असंतुलित उर्वरक प्रयोग, भूजल प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का कारण बन गई है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के असमान मूल्य निर्धारण ने खेती को अस्थायी रूप से उपजाऊ, लेकिन दीर्घकालिक रूप से अस्वस्थ बना दिया है।

पुनर्योजी कृषि: समाधान की दिशा

पुनर्योजी कृषि ऐसे सिद्धांतों पर आधारित है जो मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाकर उसकी उर्वरता को पुनर्जीवित करते हैं। इसमें प्राकृतिक खाद, फसल चक्र (Crop Rotation), जैविक मल्चिंग, और जल संरक्षण तकनीकें शामिल हैं। यह मॉडल न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिरता के लिए भी जरूरी है।

भारत के लिए यह समय है कि वह अपनी मौजूदा कृषि योजनाओं जैसे अटल इनोवेशन मिशन और अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) को इस दिशा में जोड़ दे।

नवाचार और साझेदारी का नया दौर

15 अक्टूबर को AgVaya (भारत आधारित कृषि सलाहकार फर्म) और BioSTL (अमेरिकी बायोसाइंस और कृषि नवाचार संस्था) ने मिलकर “Innovations for Regenerative Agriculture—Indian and Global Experiences” शीर्षक से एक संगोष्ठी आयोजित की। इसमें ICRIER ज्ञान साझेदार के रूप में शामिल रहा। इसी मौके पर “Global AgXelerate Platform” लॉन्च किया गया, जो कृषि नवाचारों को वैश्विक बाजारों से जोड़ने का काम करेगा। यह पहल दर्शाती है कि भारत अगर नवाचार और सहयोग को साथ लेकर चले, तो वह कृषि क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है।

पोषण सुरक्षा पर फोकस: दलहन और तिलहन को प्राथमिकता

पुनर्योजी कृषि की अवधारणा में पोषण सुरक्षा भी प्रमुख घटक है। भारत में दलहन और तिलहन उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। सरकार ने 11,440 करोड़ रुपये की लागत से “मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेज़” (2025-26 से 2030-31) शुरू किया है, जिसका लक्ष्य 350 लाख टन दाल उत्पादन है। इन फसलों में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता होती है, जिससे उर्वरक पर निर्भरता घटती है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।

आगे की राह: नीतियों में सुधार और किसानों की भागीदारी जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि दलहन और तिलहन को अगर धान और गेहूं जैसी बाजार प्रोत्साहन और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नीतियां मिलें, तभी यह आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल हो पाएगा। साथ ही, कृषि अनुसंधान और विकास (Agri-R&D) में अधिक निवेश से ही उत्पादकता और जलवायु लचीलापन बढ़ाया जा सकता है।