
अनाज बाजार
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वैश्विक व्यापार और खाद्य सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए BRICS देशों में रूस के प्रस्ताव पर ग्रेन एक्सचेंज प्लेटफॉर्म (Grain Exchange) की रूपरेखा अब तेजी से आकार ले रही है। यह प्लेटफॉर्म अमेरिका के Chicago Mercantile Exchange (CME) जैसे पश्चिमी फ्यूचर्स बाजारों के विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके साथ ही ब्राजील ने BRICS के भीतर एक मल्टीनेशनल ग्रेन रिज़र्व यानी अनाज भंडार योजना का भी प्रस्ताव रखा है, जिससे बाहरी बाजारों पर निर्भरता घटाई जा सकेगी।रूस के प्रस्ताव से भारत को बड़ा लाभ
सूत्रों के अनुसार, भारत को इस प्रस्ताव से कई स्तरों पर फायदा होगा। एक तो इससे भारतीय गेहूं, चावल, दालों और तिलहन उत्पादों के लिए नए अंतरराष्ट्रीय बाजार खुलेंगे। दूसरे, BRICS के भीतर एक वैकल्पिक ट्रेडिंग सिस्टम विकसित होने से अमेरिकी CME जैसे महंगे और असंतुलित बाजारों पर निर्भरता घटेगी।
रूस का कहना है कि BRICS ग्रेन एक्सचेंज से सदस्य देशों को हर साल लगभग 2.5 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। यह पहल 2027 तक पूरी तरह शुरू करने का लक्ष्य है, जबकि अगले वर्ष पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च किया जा सकता है।
गेहूं, मक्का और जौ से होगी शुरुआत
रूस ने सुझाव दिया है कि इस एक्सचेंज में शुरुआत में गेहूं, मक्का और जौ जैसी प्रमुख फसलों का व्यापार किया जाएगा। बाद में इसमें सोयाबीन, चावल, तिलहन और दलहनों को भी शामिल किया जा सकता है। इस प्लेटफॉर्म को विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के अनुरूप रखा जाएगा ताकि पारदर्शिता और वैधता बनी रहे।
सितंबर 2025 में रूसी उप प्रधानमंत्री दिमित्री पत्रुशेव ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर इस प्रस्ताव पर चर्चा की थी। रूस चाहता है कि अगले साल इस पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो और 2027 तक इसे पूर्ण रूप से लागू किया जाए।
ब्राजील का फूड सिक्योरिटी रिजर्व प्रस्ताव
इसी बीच, ब्राजील ने एक और पहल की है — BRICS Food Security Reserve — जिसका मकसद सदस्य देशों के बीच खाद्य भंडारण और आपूर्ति तंत्र को मजबूत करना है। इस प्रस्ताव के तहत BRICS देशों में जलवायु परिवर्तन, आपूर्ति संकट या वैश्विक मूल्य अस्थिरता की स्थिति में सहयोगात्मक रूप से खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा सकेगा। इस प्रस्ताव को New Development Bank (NDB) से वित्तीय सहायता मिलने की संभावना है, और इसे 2026 से 2028 के बीच चरणबद्ध रूप से लागू करने की योजना है। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने हाल ही में आपसी कृषि सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो इस प्रस्ताव का हिस्सा है।
अमेरिकी नीतियों से बढ़ा BRICS का एकजुट रुख
अमेरिका द्वारा हाल में बढ़ाई गई आयात शुल्क दरों (Import Tariff Hike) के बाद BRICS देशों में एक साझा आर्थिक ढांचे की जरूरत और भी महसूस की जा रही है। रूस और ब्राजील दोनों का मानना है कि अमेरिका अपनी व्यापार नीतियों का इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए कर रहा है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी नीति के बाद BRICS देशों का अमेरिका को कृषि उत्पादों का निर्यात घटा है, जिससे ये देश अब आंतरिक सहयोग मॉडल को प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि, चीन द्वारा हाल में खाद उर्वरक निर्यात रोकने के फैसले से समूह में कुछ असंतोष भी देखा गया है।
BRICS की ताकत: 45% वैश्विक अनाज उत्पादन
विस्तारित BRICS समूह (जिसमें अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान और UAE भी शामिल हैं) दुनिया के कुल अनाज उत्पादन का लगभग 45% और वैश्विक निर्यात का 25% हिस्सा रखता है। समूह के भीतर कृषि व्यापार की संभावनाएं 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक आंकी जा रही हैं।
ब्राजील, जो सोयाबीन और मक्का का शीर्ष निर्यातक है, ने कहा है कि वह इस फूड रिज़र्व को संभालने में सक्षम है, जबकि भारत अपनी खाद्यान्न उत्पादन और तकनीकी विशेषज्ञता से इस पहल में अहम भूमिका निभा सकता है।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि BRICS के दोनों प्रस्तावों रूस के ग्रेन एक्सचेंज और ब्राजील के फूड सिक्योरिटी रिजर्व को कानूनी ढांचे, पारदर्शी व्यापार व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय अनुमोदन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। वर्तमान में यह योजनाएं अधिक “अभिलाषी” हैं और इनके क्रियान्वयन के लिए ठोस वित्तीय व कानूनी तैयारी आवश्यक है।





