आलू की खेती
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किसानों के लिए राहत भरी खबर है। अब आलू की खेती के लिए खेत जोतने या बार-बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं होगी। कृषि वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें धान की कटाई के बाद खाली खेत में आलू के बीज रखकर उन्हें पराली से ढक देना ही पर्याप्त है। इससे तीन महीने में बिना जोताई और खोदाई के फसल तैयार हो जाती है।‘नीलकंठ’ किस्म का सफल ट्रायल
कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) ऊना और सिरमौर जिलों में आलू की नई किस्म ‘नीलकंठ’ का सफलतापूर्वक ट्रायल कर चुका है। इस साल इसे बड़े पैमाने पर लगाने की तैयारी चल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस किस्म में भरपूर पौष्टिक तत्व होते हैं और यह दिल के मरीजों के लिए भी फायदेमंद है। आत्मा प्रोजेक्ट के तहत खंड तकनीकी प्रबंधक डॉ. प्रवीण कुमार और डॉ. शौरभ शर्मा ने ऊना जिले की फूलपुर ग्राम पंचायत में किसानों को इस नई तकनीक से खेती की विधि समझाई।
कैसे होती है खेती
- धान की फसल की कटाई के बाद खेत को बिना हल चलाए खाली छोड़ दिया जाता है।
- खेत में आलू के बीज रखकर उन्हें धान की पराली से ढक दिया जाता है।
- अक्तूबर–नवंबर में बिजाई करने पर फरवरी तक फसल तैयार हो जाती है।
- फसल तैयार होने पर खोदाई की जरूरत नहीं पड़ती, बस पराली हटाकर आलू उठा लिए जाते हैं।
सिंचाई और खर्च दोनों में कमी
धौलाकुआं कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. पंकज मित्तल के अनुसार, इस पद्धति से उगाई जाने वाली फसल में सिर्फ तीन बार सिंचाई करनी पड़ती है। न ट्रैक्टर का खर्च, न मजदूरी यानी कम लागत में अधिक मुनाफा।
सिरमौर में पहली बार बड़े पैमाने पर उत्पादन
सिरमौर जिले के पांवटा साहिब और नाहन ब्लॉकों के तहत लगभग एक दर्जन किसानों को बीज वितरित कर प्रशिक्षण दिया गया है। इन किसानों में गोजर, काशीपुर, फूलपुर, कोलर, सालवाला, सैनवाला जैसे गांवों के किसान शामिल हैं। पिछले साल ऊना और धौलाकुआं में हुए ट्रायल के सकारात्मक नतीजों के बाद इस साल इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र ऊना अकरोट के सहायक वैज्ञानिक डॉ. सौरभ शर्मा ने बताया कि सिरमौर में यह पहली बार है जब किसान इस नई किस्म और तकनीक से आलू उगाएंगे।





