
चावल
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इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से आग्रह किया है कि बजट 2026 में चावल निर्यात क्षेत्र के लिए विशेष प्रोत्साहन दिए जाएं। फेडरेशन ने निर्यात ऋण पर 4 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी, सड़क और रेल परिवहन पर 3 प्रतिशत फ्रेट सपोर्ट और RoDTEP (निर्यात पर शुल्क व करों की वापसी) योजना के तहत समय पर भुगतान की मांग की है।IREF के अध्यक्ष प्रेम गर्ग ने कहा कि ये कदम सीधे तौर पर निर्यातकों की लागत घटाएंगे, टिकाऊ खेती को प्रोत्साहन देंगे और वैल्यू-एडेड चावल के निर्यात को बढ़ावा देंगे। उन्होंने बताया कि भारत वैश्विक चावल व्यापार में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है और वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 170 से अधिक देशों को करीब 20.1 मिलियन टन चावल का निर्यात किया है।
प्रेम गर्ग के अनुसार, चावल निर्यात केवल विदेशी मुद्रा अर्जन का साधन नहीं है, बल्कि यह किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और भारत की आर्थिक व कूटनीतिक ताकत से भी जुड़ा हुआ है। हालांकि, भूजल स्तर में गिरावट, ऊंची खरीद और भंडारण लागत तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियां इस क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं।
IREF ने बजट में टिकाऊ चावल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए टैक्स और निवेश प्रोत्साहन देने की मांग की है। इनमें पानी बचाने और कम उत्सर्जन वाली तकनीकों जैसे ऑल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग (AWD), डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR), लेजर लेवलिंग और ऊर्जा दक्ष मिलिंग को शामिल किया गया है।
इसके साथ ही फेडरेशन ने किसानों को अधिक लाभ दिलाने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर दबाव कम करने के लिए प्रीमियम बासमती, GI टैग, ऑर्गेनिक और स्पेशियलिटी नॉन-बासमती किस्मों की खेती को बढ़ावा देने की सिफारिश की है।
वर्किंग कैपिटल को लेकर IREF ने खासतौर पर MSME निर्यातकों के लिए 4 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी की मांग की है, जिससे नकदी प्रवाह सुधरे और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के लिहाज से प्रतिस्पर्धा बढ़े।
लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने के लिए संगठन ने निर्यात के लिए क्लस्टर से पोर्ट या ICD तक होने वाले सड़क और रेल परिवहन पर 3 प्रतिशत फ्रेट रीइम्बर्समेंट की मांग की है, साथ ही इसके लिए सरल डिजिटल क्लेम व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया है।
एक अहम मांग पिछली तारीख से लगाए गए 20 प्रतिशत निर्यात शुल्क से जुड़े मामलों को लेकर है। IREF का कहना है कि ड्यूटी की गणना को लेकर अलग-अलग व्याख्याओं के कारण कई निर्यातकों पर भारी रेट्रोस्पेक्टिव डिमांड बनी, जबकि निर्यात सद्भावना में किया गया था। ऐसे मामलों में एकमुश्त छूट देने से विवाद कम होंगे और सेक्टर को स्थिरता मिलेगी।
इसके अलावा फेडरेशन ने निर्यात वित्त गारंटी, टेस्टिंग, ट्रेसबिलिटी और क्वालिटी इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की भी मांग की है, ताकि प्रीमियम वैश्विक बाजारों में भारत की साख बनी रहे।




