*खाता धारकों का नुक़सान बैंक भरें*
*बैंक कर्मचारी ही ऐसी गड़बड़ियां करते हैं, अगर बैंक के आंतरिक हिस्से तक किसी बाहरी की पहुंच होती भी है तब भी इसके लिए बैंक कर्मचारी ही जिम्मेदार है*
पत्रकार की लेख ।प्रवीण कुमार मिश्रा एम एनटी न्यूज़ भारत । यूपी।
👉आज का लेख, हर उस आदमी के लिए है, जिसका बैंक में खाता है।
मतलब, इस देश के 140 करोड़ लोगों में से, लगभग 130 करोड़ लोगों के लिए है।
क्योंकि आज, बैंक में खाता न होना, लगभग असंभव है।
– मनरेगा का पैसा, बैंक में आता है।
– किसान सम्मान निधि, बैंक में आती है।
– पेंशन, बैंक में आती है।
– तनख्वाह, बैंक में आती है।
– छात्रवृत्ति, बैंक में आती है।
– उज्ज्वला का पैसा, बैंक में आता है।
– लाडली बहना, बैंक में आती है।
बैंक, अब सिर्फ बैंक नहीं है। बैंक, अब आपकी तिजोरी है, आपका घर है, आपकी जिंदगी है।
और उसी तिजोरी से, अगर पैसा गायब हो जाए, तो जिम्मेदार कौन है?
आप? बैंक? कर्मचारी? हैकर? सरकार?
आज का लेख, इसी सवाल पर है। और मेरा जवाब, साफ है –
*खाता धारकों का नुक़सान, बैंक भरें।*
*बैंक कर्मचारी ही, ऐसी गड़बड़ियां करते हैं। अगर बैंक के आंतरिक हिस्से तक, किसी बाहरी की पहुंच होती भी है, तब भी, इसके लिए, बैंक कर्मचारी ही जिम्मेदार है।*
ये बात, कड़वी लग सकती है, बैंक वालों को बुरी लग सकती है, लेकिन यही सच है। और इस सच को, आज, 3000 शब्दों में, खोलकर समझना जरूरी है।
1. बैंक क्या है? भरोसे का नाम है
पहले, समझिए, बैंक क्या है।
बैंक, कोई दुकान नहीं है, जहां आप सामान खरीदते हैं। बैंक, कोई सरकारी दफ्तर नहीं है, जहां आप फॉर्म भरते हैं।
बैंक, भरोसे का नाम है।
जब एक गरीब किसान, अपनी गाढ़ी कमाई का 500 रुपया, बैंक में जमा करता है, तो वो, बैंक के बिल्डिंग पर भरोसा नहीं करता, बैंक के बोर्ड पर भरोसा नहीं करता, वो, बैंक के उस भरोसे पर, पैसा देता है, कि “मेरा पैसा, यहां सुरक्षित है।”
जब एक विधवा महिला, अपनी पेंशन का पैसा, बैंक में रखती है, तो वो, ये सोचकर रखती है, कि “बैंक, मेरा पैसा, मेरी जान से ज्यादा संभालकर रखेगा।”
जब एक मजदूर, दिल्ली में, दिनभर, ईंट उठाकर, 400 रुपया कमाता है, और 200 रुपया, गांव, अपनी पत्नी के खाते में भेजता है, तो वो, ये सोचकर भेजता है, कि “बैंक, मेरा पैसा, सही जगह, सही आदमी तक, पहुंचा देगा।”
बैंक, इसी भरोसे पर चलता है।
और जब यही भरोसा टूटता है, तो सिर्फ पैसा नहीं टूटता, आदमी टूट जाता है।
एक आदमी, जिसका 50 हजार रुपया, बैंक से गायब हो गया, वो, सिर्फ 50 हजार नहीं खोता। वो, अपना भरोसा खोता है, अपनी नींद खोता है, अपनी इज्जत खोता है।
कई बार, वो, कर्ज में डूब जाता है। कई बार, उसकी बेटी की शादी टूट जाती है। कई बार, उसकी दवा छूट जाती है। कई बार, वो, आत्महत्या तक कर लेता है।
क्या बैंक, ये समझता है?
नहीं, बैंक, ये नहीं समझता। बैंक, सिर्फ एक बात समझता है – “ग्राहक ने OTP बताया होगा, ग्राहक ने लिंक क्लिक किया होगा, ग्राहक की गलती है।”
यही, सबसे बड़ा झूठ है, जो बैंक, पिछले 10 साल से, बोल रहा है।
2. OTP का झूठ, लिंक का झूठ, ग्राहक की गलती का झूठ
आज, बैंक में, अगर आपके खाते से, पैसा गायब हो, तो बैंक का पहला जवाब, क्या होता है?
“आपने, किसी को OTP बताया होगा।”
“आपने, किसी अनजान लिंक पर, क्लिक किया होगा।”
“आपने, अपना पासवर्ड, किसी को बताया होगा।”
“आप, जागरूक नहीं थे।”
मतलब, चोर, बैंक में घुसा, तिजोरी तोड़ी, पैसा ले गया, और दोष, आपका, क्योंकि आपने, ताला, ठीक से नहीं लगाया?
क्या यही न्याय है?
मान लीजिए, आपने, अपना घर, ताला लगाकर, बंद किया। चोर आया, ताला तोड़ा, सामान ले गया। क्या पुलिस, आपसे कहेगी – “आपने, ताला, ठीक से नहीं लगाया, इसलिए, आपकी गलती है, चोर की नहीं?”
नहीं कहेगी। पुलिस, चोर को पकड़ेगी।
तो फिर, बैंक में, ऐसा क्यों?
बैंक, कहता है – “हमने, आपको, SMS भेजा था, OTP मत बताइए। हमने, आपको, अखबार में, विज्ञापन दिया था, लिंक मत खोलिए।”
अरे भाई, SMS भेजना, क्या सुरक्षा है?
एक अनपढ़ किसान, जिसने, कभी, अंग्रेजी नहीं पढ़ी, वो, SMS क्या समझेगा? एक बूढ़ी महिला, जिसको, मोबाइल चलाना नहीं आता, वो, OTP क्या समझेगी? एक मजदूर, जो, दिनभर, धूप में काम करता है, वो, लिंक और फिशिंग में, क्या फर्क समझेगा?
बैंक, उन लोगों से, डिजिटल जागरूकता की उम्मीद करता है, जिनको, बैंक ने, कभी, डिजिटल सिखाया ही नहीं।
बैंक ने, खाता तो खोल दिया, जनधन में, जीरो बैलेंस में, लेकिन, सुरक्षा, सिखाई क्या?
नहीं।
बैंक ने, गांव-गांव, खाता खोलने का कैंप लगाया, लेकिन, गांव-गांव, सुरक्षा सिखाने का कैंप, कभी नहीं लगाया।
और जब, पैसा गायब हुआ, तो कह दिया – “ग्राहक, जागरूक नहीं था।”
ये, जागरूकता नहीं, ये, बहानेबाजी है।
3. असली चोर, बाहर नहीं, अंदर है
अब, आते हैं, सबसे बड़ी बात पर, जो इस लेख की आत्मा है –
*बैंक कर्मचारी ही, ऐसी गड़बड़ियां करते हैं।*
मैं, ये बात, हवा में नहीं कह रहा हूं। मैं, ये बात, पिछले 20 साल के, अखबारों की खबरों, कोर्ट के फैसलों, RBI की रिपोर्टों, और गांव की सच्चाई से, कह रहा हूं।
याद कीजिए –
– कभी, बैंक में, खाता खोलने के लिए, आपने, आधार दिया, पैन दिया, फोटो दिया, हस्ताक्षर दिए। वो, कागज, कहां गए? वो, बैंक के अंदर हैं। बाहर वाला, आपके आधार की कॉपी, कैसे लेगा? बाहर वाला, आपके हस्ताक्षर की कॉपी, कैसे लेगा? बाहर वाला, आपके खाते का नंबर, आपकी जन्मतिथि, आपकी मां का नाम, कैसे जानेगा?
ये सब, बैंक के अंदर है।
– कभी, आपने, देखा है, बैंक में, एक कर्मचारी, दूसरे कर्मचारी के कंप्यूटर पर, काम करता है? एक का पासवर्ड, दूसरे को पता है? एक की ID से, दूसरा, पैसा ट्रांसफर करता है? ये, हर बैंक में, होता है।
– कभी, आपने, देखा है, बैंक मैनेजर, छुट्टी पर है, और, उसका पासवर्ड, क्लर्क के पास है? कभी, आपने, देखा है, कैशियर, खाना खाने गया है, और, उसका कैश, खुला पड़ा है?
ये, सब, बैंक की आंतरिक गड़बड़ी है।
बाहर का आदमी, बैंक के सर्वर तक, कैसे पहुंचेगा, अगर, अंदर का आदमी, दरवाजा न खोले?
बाहर का हैकर, कितना भी बड़ा हो, वो, बैंक के कोर बैंकिंग सिस्टम में, तब तक नहीं घुस सकता, जब तक, अंदर का कोई आदमी, उसे, रास्ता न बताए, पासवर्ड न दे, OTP न बताए, या, जानबूझकर, सिस्टम को, खुला न छोड़ दे।
इसलिए, मैं, फिर कहता हूं –
*अगर बैंक के आंतरिक हिस्से तक, किसी बाहरी की पहुंच होती भी है, तब भी, इसके लिए, बैंक कर्मचारी ही जिम्मेदार है।*
क्योंकि, बैंक का आंतरिक हिस्सा, बैंक की संपत्ति है। उसकी सुरक्षा, बैंक की जिम्मेदारी है।
अगर, आपके घर में, चोर, आपकी नौकर की मदद से, घुसा, तो क्या, आप, नौकर को, जिम्मेदार नहीं मानेंगे? मानेंगे।
तो, बैंक में, अंदर के आदमी की मदद से, चोर घुसा, तो बैंक, जिम्मेदार क्यों नहीं?
4. कुछ सच्ची घटनाएं, जो अखबारों में आईं, लेकिन हम भूल गए
मैं, कुछ घटनाएं, याद दिलाता हूं, नाम नहीं लूंगा, क्योंकि, नाम लेने से, बात, छोटी हो जाएगी, बात, बड़ी है।
*घटना 1 – उत्तर प्रदेश का एक गांव*
एक किसान, बैंक गया, पासबुक अपडेट कराने। पासबुक में, देखा, उसके खाते से, 80 हजार रुपया, गायब है। उसने, कभी, ATM नहीं चलाया, कभी, OTP नहीं बताया, कभी, लिंक नहीं खोला।
जांच हुई, तो पता चला, बैंक के ही, एक कर्मचारी ने, किसान के हस्ताक्षर की नकल करके, फर्जी निकासी फॉर्म भरकर, पैसा निकाल लिया था।
बैंक ने, पहले, कहा – “किसान की गलती है।” बाद में, जब, पुलिस ने, CCTV देखा, तो कर्मचारी, पकड़ा गया।
किसान का पैसा, 2 साल बाद, मिला। 2 साल में, किसान, कर्ज में डूब गया, उसकी बेटी की शादी, टूट गई।
क्या बैंक ने, किसान को, ब्याज दिया? क्या बैंक ने, किसान से, माफी मांगी? नहीं।
*घटना 2 – बिहार का एक शहर*
एक महिला, जिसका पति, बाहर कमाता था, हर महीने, पैसा भेजता था। एक दिन, खाते से, 1 लाख 20 हजार, गायब।
महिला, रोती हुई, बैंक गई। बैंक ने कहा – “आपने, OTP बताया होगा।”
महिला ने कहा – “मुझे, OTP क्या होता है, पता ही नहीं। मेरे पास, तो, स्मार्टफोन ही नहीं है, कीपैड वाला फोन है।”
फिर, जांच हुई, तो पता चला, बैंक के ही, एक कर्मचारी ने, महिला के खाते से, अपने रिश्तेदार के खाते में, पैसा ट्रांसफर किया था, और, महिला के मोबाइल नंबर की जगह, अपना मोबाइल नंबर, सिस्टम में डाल दिया था, ताकि, OTP, उसी के पास जाए।
क्या ये, बाहर के हैकर ने किया? नहीं। अंदर के कर्मचारी ने किया।
*घटना 3 – महाराष्ट्र का एक कस्बा*
एक बुजुर्ग, रिटायर शिक्षक, उनकी पेंशन, हर महीने, आती थी। एक दिन, पेंशन, नहीं आई। बैंक गया, तो पता चला, उनका खाता, किसी और के नाम पर, ट्रांसफर हो गया है।
कैसे? बैंक के कर्मचारी ने, फर्जी कागज बनाकर, खाता, किसी और के नाम पर, कर दिया था।
बुजुर्ग, 6 महीने, बैंक के चक्कर लगाता रहा। 6 महीने, बिना पेंशन के, कैसे जिया, ये, वो ही जानता है।
ये, तीन घटनाएं, सिर्फ उदाहरण हैं। ऐसी, हजारों घटनाएं, हर साल, होती हैं।
RBI की रिपोर्ट, खुद कहती है, कि बैंक फ्रॉड में, 60-70% मामले, अंदर के लोगों की मिलीभगत से, होते हैं।
फिर भी, बैंक, ग्राहक को, दोषी ठहराता है। क्यों?
क्योंकि, ग्राहक को, दोषी ठहराना, सस्ता है। कर्मचारी को, दोषी ठहराना, महंगा है।
ग्राहक को, दोषी ठहराओ, तो, पैसा, नहीं देना पड़ेगा। कर्मचारी को, दोषी ठहराओ, तो, पैसा, भी देना पड़ेगा, और, अपनी गलती, भी माननी पड़ेगी।
बैंक, अपनी गलती, मानना नहीं चाहता।
5. बैंक, पैसा कमाता है, तो नुकसान भी बैंक भरे
एक और, सीधी बात, समझिए।
बैंक, आपके पैसे से, क्या करता है?
आप, बैंक में, पैसा जमा करते हैं, बैंक, आपको, 3% ब्याज देता है, और, उसी पैसे को, बड़े-बड़े लोगों को, 9%, 10%, 12% पर, कर्ज देता है।
बैंक, आपके पैसे से, कमाता है।
बैंक, आपके पैसे से, अपनी बिल्डिंग बनाता है, अपने कर्मचारियों को, तनख्वाह देता है, अपने मैनेजर को, गाड़ी देता है, अपने बोर्ड को, बोनस देता है।
जब, फायदा, बैंक का है, तो, नुकसान, ग्राहक का, क्यों?
अगर, बैंक, आपके पैसे से, कमा रहा है, तो, आपके पैसे की सुरक्षा की, जिम्मेदारी, भी, बैंक की है।
ये, कोई नया सिद्धांत नहीं है। ये, कानून का सिद्धांत है – *”जो फायदा उठाता है, वो, नुकसान भी भरे।”*
अंग्रेजी में, इसे कहते हैं – *”Vicarious Liability”* – मालिक, अपने नौकर की गलती के लिए, जिम्मेदार है।
अगर, बैंक का कर्मचारी, गलती करता है, तो, बैंक, जिम्मेदार है।
अगर, बैंक का कंप्यूटर, हैक होता है, तो, बैंक, जिम्मेदार है, क्योंकि, कंप्यूटर, बैंक का है, ग्राहक का नहीं।
अगर, बैंक का सर्वर, डाउन होता है, तो, बैंक, जिम्मेदार है।
ग्राहक, बैंक का, मालिक नहीं है, ग्राहक, बैंक का, मेहमान है। मेहमान के सामान की, सुरक्षा, मेजबान की जिम्मेदारी है।
6. RBI क्या कहता है? कोर्ट क्या कहता है?
अब, कुछ लोग, कहेंगे – “ये, तो, आपकी बात है, कानून, क्या कहता है?”
कानून, भी, यही कहता है।
RBI ने, साफ कहा है – अगर, ग्राहक की गलती नहीं है, और, खाते से, पैसा, गलत तरीके से, निकला है, तो, बैंक, 10 दिन के अंदर, पूरा पैसा, ग्राहक को, वापस करेगा।
RBI का सर्कुलर, 2017 का है, आज भी, लागू है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी, कई फैसलों में, कहा है – “बैंक, अपने ग्राहक के पैसे का, ट्रस्टी है। ट्रस्टी, अगर, पैसा, संभाल नहीं पाया, तो, वो, पैसा, वापस करेगा, ब्याज सहित।”
उपभोक्ता फोरम ने भी, कई बार, बैंक को, पैसा वापस करने का, आदेश दिया है।
लेकिन, दिक्कत, क्या है?
दिक्कत, ये है, कि, आम आदमी, RBI का सर्कुलर, नहीं जानता। आम आदमी, सुप्रीम कोर्ट का फैसला, नहीं जानता। आम आदमी, उपभोक्ता फोरम, कहां है, नहीं जानता।
और बैंक, इसी, अज्ञानता का, फायदा उठाता है।
बैंक, ग्राहक को, 10 दिन में, पैसा वापस नहीं करता। बैंक, ग्राहक को, 10 महीने, चक्कर लगवाता है।
– पहले, कहेगा, “एप्लीकेशन लिखिए।”
– फिर, कहेगा, “FIR कराइए।”
– फिर, कहेगा, “साइबर सेल जाइए।”
– फिर, कहेगा, “हेड ऑफिस से, जवाब नहीं आया।”
– फिर, कहेगा, “आप, कोर्ट जाइए।”
ग्राहक, थक जाता है। 20 हजार के लिए, कोर्ट जाने में, 50 हजार खर्च होगा, तो, वो, छोड़ देता है।
बैंक, यही चाहता है – ग्राहक, थककर, छोड़ दे।
क्या यही, न्याय है?
7. कर्मचारी की जिम्मेदारी, कैसे तय हो?
अब, सवाल है, कर्मचारी की जिम्मेदारी, कैसे तय हो?
मेरा, साफ प्रस्ताव है, 5 बिंदुओं में –
*1. हर ट्रांजेक्शन की, CCTV और बायोमेट्रिक जांच हो*
बैंक में, हर निकासी, हर ट्रांसफर, हर खाता खोलने पर, कर्मचारी का, फिंगरप्रिंट, उसकी ID, उसकी CCTV रिकॉर्डिंग, होनी चाहिए। ताकि, बाद में, पता चले, किसने, क्या किया।
आज, बैंक में, ग्राहक का, फिंगरप्रिंट लिया जाता है, कर्मचारी का, नहीं। क्यों? कर्मचारी, भगवान है क्या?
*2. ग्राहक को, तुरंत, पैसा वापस हो*
अगर, खाते से, पैसा, बिना ग्राहक की सहमति के, निकला है, तो, बैंक, 7 दिन में, पैसा वापस करे, जांच, बाद में होती रहे।
जांच, बैंक की है, सजा, ग्राहक को, क्यों?
*3. कर्मचारी की गलती पर, बैंक, कर्मचारी से, वसूले, ग्राहक से नहीं*
अगर, जांच में, कर्मचारी, दोषी पाया जाए, तो, बैंक, उस कर्मचारी से, पैसा वसूले, उसकी तनख्वाह से, काटे, उसकी संपत्ति, जब्त करे। लेकिन, ग्राहक को, पहले, पैसा दे।
*4. बैंक के अंदर की गड़बड़ी, बैंक की गड़बड़ी मानी जाए*
अगर, बाहर के आदमी ने, बैंक के सिस्टम को, हैक किया, तो, ये, बैंक की सुरक्षा की, विफलता है। बैंक ने, अच्छा, सॉफ्टवेयर, क्यों नहीं लगाया? बैंक ने, अच्छा, फायरवॉल, क्यों नहीं लगाया? बैंक ने, कर्मचारियों को, ट्रेनिंग, क्यों नहीं दी?
इसलिए, बाहरी हैकर की गलती भी, बैंक की गलती है।
*5. बैंक मैनेजर की, व्यक्तिगत जिम्मेदारी हो*
आज, बैंक में, गड़बड़ी होती है, तो, कोई, जिम्मेदार नहीं होता। मैनेजर कहता है – “मुझे, पता नहीं।” क्लर्क कहता है – “मैंने, नहीं किया।” हेड ऑफिस कहता है – “हमें, पता नहीं।”
ऐसा, नहीं चलेगा।
हर शाखा के मैनेजर की, व्यक्तिगत जिम्मेदारी हो, कि, उसकी शाखा में, अगर, गड़बड़ी हुई, तो, वो, जवाब देगा।
जब, मैनेजर को, लगेगा, कि, गड़बड़ी हुई, तो, मेरी नौकरी जाएगी, मेरी तनख्वाह कटेगी, तो, वो, खुद, निगरानी करेगा।
8. जनधन खाता, गरीब का खाता, सबसे ज्यादा खतरे में
एक बात, और, समझिए, जो, सबसे दर्दनाक है।
जिसका, ज्यादा पैसा है, वो, तो, वकील कर लेगा, कोर्ट चला जाएगा, अखबार में, खबर छपवा देगा।
लेकिन, जिसका, जनधन खाता है, जिसमें, 2000-5000 रुपया है, वो, क्या करेगा?
वो, बैंक जाएगा, बैंक वाला, उसे, डांटकर, भगा देगा – “जाओ, जाओ, तुम्हारे 2000 के लिए, हमारे पास, टाइम नहीं है।”
वो, पुलिस जाएगा, पुलिस कहेगी – “2000 के लिए, FIR नहीं होगी।”
वो, साइबर सेल जाएगा, वहां, कोई, सुनेगा नहीं।
और, वो, चुपचाप, घर आ जाएगा, और, सोचेगा – “बैंक ने, मेरा पैसा, खा लिया।”
क्या, ये, देश के, गरीबों के साथ, न्याय है?
जनधन खाता, सरकार ने, गरीबों को, बैंक से जोड़ने के लिए, खोला था। लेकिन, अगर, उसी खाते से, पैसा, गायब होगा, और, बैंक, जिम्मेदारी नहीं लेगा, तो, गरीब, बैंक से, फिर, दूर हो जाएगा। वो, फिर, साहूकार के पास जाएगा, फिर, ब्याज पर, पैसा लेगा, फिर, कर्ज में, डूबेगा।
इसलिए, गरीब के खाते का, नुकसान, बैंक को, सबसे पहले, भरना चाहिए।
9. बैंक कर्मचारी, सब बुरे नहीं हैं, लेकिन सिस्टम, बुरा है
मैं, ये भी, साफ कर दूं, कि, मैं, ये नहीं कह रहा, कि, सारे बैंक कर्मचारी, बुरे हैं।
नहीं।
बहुत से, बैंक कर्मचारी, ईमानदार हैं, मेहनती हैं, सुबह, 10 बजे से, रात, 8 बजे तक, काम करते हैं, ग्राहकों की, गालियां, भी सुनते हैं, और, फिर भी, मुस्कुराकर, काम करते हैं।
मैं, उनको, सलाम करता हूं।
लेकिन, सिस्टम, ऐसा है, कि, एक बुरा कर्मचारी, पूरे बैंक को, बदनाम कर देता है, और, अच्छा कर्मचारी, चुप रहता है, क्योंकि, उसे, डर लगता है, कि, अगर, उसने, शिकायत की, तो, उसका, ट्रांसफर हो जाएगा, उसकी, नौकरी, खतरे में आ जाएगी।
इसलिए, जरूरत, सिस्टम बदलने की है।
बैंक में, व्हिसल ब्लोअर की, सुरक्षा होनी चाहिए। अगर, कोई कर्मचारी, अपने साथी की, गड़बड़ी की, शिकायत करता है, तो, उसे, इनाम मिलना चाहिए, सजा नहीं।
बैंक में, हर महीने, ऑडिट होना चाहिए, बाहर की एजेंसी से, न कि, अंदर के लोगों से। अंदर के लोग, अंदर की गड़बड़ी, कैसे पकड़ेंगे?
बैंक में, ग्राहकों को, हर 6 महीने में, उनके खाते की, पूरी जानकारी, उनकी भाषा में, दी जानी चाहिए – “आपके खाते से, किसने, कब, कितना, पैसा निकाला, क्यों निकाला।”
जब, पारदर्शिता आएगी, तो, गड़बड़ी, अपने आप, कम होगी।
10. अंत में – एक सवाल, आपसे
मैं, इस लेख को, एक सवाल से, खत्म करना चाहता हूं।
कल, अगर, आपके खाते से, 10 हजार रुपया, गायब हो जाए, और, बैंक, कहे – “आपकी गलती है”, तो, आप, क्या करेंगे?
– चुप रहेंगे?
– बैंक के चक्कर लगाएंगे?
– पुलिस जाएंगे?
– कोर्ट जाएंगे?
– या, अखबार में, खबर छपवाएंगे?
और, अगर, आपके साथ, ऐसा, हो चुका है, तो, कमेंट में, लिखिए।
क्योंकि, जब तक, हम, चुप रहेंगे, तब तक, बैंक, हमें, दोषी ठहराता रहेगा।
जब, हम, बोलेंगे, तब, बैंक को, सुनना पड़ेगा।
मेरी मांग, साफ है, और, मैं, इसे, फिर, दोहराता हूं –
*1. खाता धारकों का नुक़सान, बैंक भरें।*
*2. बैंक कर्मचारी ही, ऐसी गड़बड़ियां करते हैं, अगर, बैंक के आंतरिक हिस्से तक, किसी बाहरी की पहुंच होती भी है, तब भी, इसके लिए, बैंक कर्मचारी ही, जिम्मेदार है।*
*3. ग्राहक को, 7 दिन में, पैसा, वापस मिले, जांच, बाद में हो।*
*4. बैंक मैनेजर की, व्यक्तिगत जिम्मेदारी, तय हो।*
ये, कोई, क्रांति की मांग नहीं है। ये, भरोसे की मांग है।
बैंक, भरोसे पर चलता है। भरोसा, टूटा, तो, बैंक, टूटेगा।
और, अगर, बैंक, टूटा, तो, देश, टूटेगा।
क्योंकि, बैंक में, सिर्फ, पैसा नहीं है, बैंक में, इस देश के, 130 करोड़ लोगों का, भरोसा है।
भरोसा, बचाइए, बैंक, बच जाएगा।
भरोसा, तोड़िए, बैंक, टूट जाएगा।
*मेरी बात, अगर, कड़वी लगी हो, तो, क्षमा प्रार्थी हूं, लेकिन, सच, यही है।*
*KCN । प्रवीण कुमार मिश्र देवी पाटन मंडल ब्यूरो चीफ एम एनटी न्यूज भारत