अनुकंपा नियुक्ति को लेकर लंबे समय से चल रही बहस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। पुलिस विभाग में सब-इंस्पेक्टर के पद पर मृतक पुलिसकर्मियों के आश्रितों को नौकरी देने के लिए पांच प्रतिशत की सीमा तय करने वाले प्रावधान को अदालत ने वैध माना है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जब उपलब्ध पदों की तुलना में दावेदार ज्यादा हों, तो चयन के लिए परीक्षा कराना नियमों के खिलाफ नहीं है।
पीठ ने दिया ये फैसला
न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की पीठ ने यह फैसला दिवंगत पुलिसकर्मियों के आश्रितों की याचिकाओं पर सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने 2015 की पुलिस सेवा नियमावली के उस प्रावधान को चुनौती दी थी, जिसके तहत अनुकंपा के आधार पर सब-इंस्पेक्टर पद पर नियुक्तियां सीधी भर्ती के लिए निर्धारित पदों के पांच प्रतिशत तक सीमित हैं।
याचियों का कहना था कि 1974 के नियमों में ऐसी कोई सीमा तय नहीं की गई थी। उनका तर्क था कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल सहारा देना है, ऐसे में लिखित और शारीरिक परीक्षा की प्रक्रिया इस उद्देश्य को प्रभावित करती है।
हाईकोर्ट ने इस तर्क से असहमति जताई। अदालत के मुताबिक, यदि सीमित संख्या में पद उपलब्ध हैं और उनके लिए आवेदकों की संख्या अधिक है, तो सभी उम्मीदवारों के बीच निष्पक्ष तरीके से चयन के लिए वस्तुनिष्ठ परीक्षा कराना अनुचित नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने संबंधित नियम और 18 सितंबर 2015 के शासनादेश को बरकरार रखते हुए याचिकाएं खारिज कर दीं।
याची ने दी ये दलील
इसी बीच हाईकोर्ट ने आगरा से जुड़े एक अलग मामले में नाहर सिंह यादव को राहत दी। न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने का आदेश दिया। अदालत के सामने यह मामला जिला न्यायालय आगरा की बार एसोसिएशन की कमेटी से जुड़े विवाद का था।
याची की ओर से दलील दी गई कि विवाद की वास्तविक प्रकृति सिविल है और इसे आपराधिक मुकदमे में बदलकर कार्रवाई की गई। अदालत ने दलीलों पर विचार करने के बाद 17 दिसंबर 2024 की चार्जशीट, 16 मई के संज्ञान-सम्मन आदेश और जगदीशपुरा थाने की संबंधित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।





















