काठमांडू: नेपाल-तिब्बत सीमा के समीप ग्लेशियर व चट्टानों के खिसकने से आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल के उत्तरी एवं मध्य भागों में भारी तबाही मचाई है। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) द्वारा जारी शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार, इस त्रासदी में अब तक 1,344 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 32,933 से अधिक नागरिक प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं।
इन्फ्रास्ट्रक्चर को भारी क्षति
26 अगस्त को आए इस प्राकृतिक प्रकोप से देश की बुनियादी संरचनाओं को गहरा झटका लगा है:
-
यातायात ठप: लगभग 55 किलोमीटर मुख्य सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई हैं। इसके अतिरिक्त 37 वाहन पुल और 68 झूला पुल ध्वस्त हो चुके हैं, जिससे कई क्षेत्रों का संपर्क कट गया है।
-
स्वास्थ्य एवं शिक्षा क्षेत्र पर असर: 4 स्वास्थ्य केंद्र पूर्णतः नष्ट हो गए हैं तथा 3 अन्य को आंशिक नुकसान पहुंचा है। शैक्षणिक संस्थानों के क्षतिग्रस्त होने से 6,500 से अधिक विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हुई है।
राहत कार्यों में कुप्रबंधन का आरोप
प्रतिनिधि सभा के सदस्य और नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन नरसिंह केसी ने सरकार के राहत एवं बचाव अभियानों के समन्वय में गंभीर कमियों की तीखी आलोचना की है। हालांकि, उन्होंने खोज एवं बचाव कार्य में जुटी नेपाल सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के प्रयासों की सराहना की। केसी के अनुसार, इस आपदा से नेपाल को 800 अरब रुपये से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है।
जलवायु न्याय और सर्वदलीय निगरानी समिति की मांग
नेपाल की इस त्रासदी को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से जोड़ते हुए वरिष्ठ नेताओं ने वैश्विक मंचों पर 'जलवायु न्याय' (Climate Justice) और मुआवजे की मांग उठाने पर बल दिया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की चेतावनियों का उल्लेख करते हुए सरकार से आग्रह किया गया है कि राहत सामग्री के पारदर्शी वितरण हेतु एक उच्चस्तरीय संसदीय निगरानी समिति एवं सर्वदलीय व्यवस्था का गठन किया जाए।































