हिमाचल में बाहर से आते हैं 80% बीज: नौणी यूनिवर्सिटी की आत्मनिर्भर बीज क्रांति, 5 FPC के साथ शुरू किया उत्पादन

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बीज उत्पादन

बीज उत्पादन
– फोटो : सोशल मीडिया

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हिमाचल प्रदेश में खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले 80 प्रतिशत बीज अन्य राज्यों से आते हैं। राज्य बीज प्रमाणन एजेंसी के 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार, यह निर्भरता प्राकृतिक खेती के विस्तार में बड़ी बाधा बन रही है। डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी ने प्राकृतिक खेती को मजबूत करने के लिए किसान उत्पादक कंपनियों (FPC) के माध्यम से स्थानीय बीज उत्पादन शुरू किया है। यह परियोजना बायोवर्सिटी इंटरनेशनल और CIAT द्वारा वित्त पोषित है।  प्राकृतिक खेती जलवायु-अनुकूल, पर्यावरण-अनुकूल और कम लागत वाली प्रणाली के रूप में तेजी से उभर रही है। हिमाचल में 2.2 लाख से अधिक किसान इसे अपना चुके हैं। विश्वविद्यालय के शोध निदेशक डॉ. संजीव चौहान ने बताया कि रसायनों का उपयोग न करके स्थानीय संसाधनों पर निर्भरता ही इसकी ताकत है।  

परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. सुधीर वर्मा ने बताया कि पांच FPC को क्षेत्रीय फसलों के अनुसार जिम्मेदारी दी गई है। करसोग में अनाज, बाजरा और सब्जियों के बीज तैयार किए जाएंगे। चौपाल में अनाज, व सब्जियों, पच्छाद एवं सोलन में अनाज, सब्जियां, लहसुन व अदरक और सुंदरनगर में अनाज व सब्जियों के बीज तैयार किए जाएंगे। 

विश्वविद्यालय का वैज्ञानिक सहयोग
विश्वविद्यालय वैज्ञानिक बीज संग्रह, संरक्षण, गुणन और वितरण के लिए प्रोटोकॉल विकसित करेंगे। साथ ही आणविक और पोषण प्रोफाइलिंग भी की जाएगी।

बीज आत्मनिर्भरता क्यों जरूरी
डॉ. चौहान ने कहा, “प्राकृतिक खेती के बीजों की मांग आपूर्ति से कहीं अधिक है। बाहरी या रासायनिक बीजों का उपयोग प्राकृतिक खेती के उद्देश्य को कमजोर करता है। बीजों में आत्मनिर्भरता ही इसकी दीर्घकालिक सफलता की कुंजी है।”

विकेंद्रीकृत प्रणाली और सामुदायिक बैंक
FPC के माध्यम से विकेंद्रीकृत शासन को बढ़ावा दिया जाएगा। चयनित FPC में सामुदायिक बीज बैंक स्थापित किए जाएंगे। कम लागत वाली, जलवायु-अनुकूल भंडारण संरचना बनेगी। मिट्टी के घड़े, कोठार और डिब्बों जैसे पारंपरिक तरीकों को बेहतर वेंटिलेशन और लेबलिंग के साथ पुनर्जीवित किया जाएगा।  

कुलपति प्रो. राजेश्वर चंदेल ने कहा, “ यह पहल स्थानीय स्तर पर जलवायु-अनुकूल बीज सस्ते दामों पर उपलब्ध कराएगी, जिससे किसानों की महंगे हाइब्रिड बीजों पर पर निर्भरता कम होगी। पर्यावरणीय रूप से जैव विविधता बढ़ेगी, कार्बन फुटप्रिंट घटेगा। सामाजिक रूप से रोजगार बनेगा और पारंपरिक ज्ञान को सम्मान मिलेगा।”