डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट के एक नेता की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता ने पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश देने की मांग की थी कि वे बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की याचिकाओं पर जल्द फैसला लें। कोर्ट ने उन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट जाने को कहा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय द्वारा दायर याचिका का निपटारा करते हुए उन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट जाने का निर्देश दिया। पीठ ने कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया कि वे इस मामले को सुनवाई के लिए डिवीजन बेंच (खंडपीठ) के समक्ष रखें।
पीठ ने क्या आदेश दिया?
पीठ ने आदेश दिया, “हमें लगता है कि याचिकाकर्ता को कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख करना चाहिए। इसलिए, हम इस स्तर पर इस याचिका का निपटारा करते हैं और याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट में उचित याचिका दायर करने की छूट देते हैं। हम हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध करते हैं कि वे इस मामले को तत्काल विचार के लिए डिवीजन बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करें और जल्द से जल्द इस पर फैसला लें।”
शुरुआत में, पीठ ने गौर किया कि विधानसभा अध्यक्ष से यह उम्मीद की जाती है कि वे 8 जुलाई को दायर अयोग्यता याचिकाओं पर तीन महीने के भीतर फैसला लें।
चट्टोपाध्याय की ओर से पेश वकील ने कहा कि बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं जुलाई में दायर की गई थीं, लेकिन पांच महीने बीत जाने के बाद भी इन पर कोई फैसला नहीं आया है।
याचिकाकर्ता के वकील ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “हम आपकी बात समझते हैं। लेकिन आप अपनी बारी से पहले सुनवाई पाने के लिए कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकते।” वकील ने पीठ से आग्रह किया कि वह हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच को इस मामले पर विचार करने का निर्देश दे, ताकि यह मामला कोर्ट के भीतर होने वाली अपीलों के किसी और दौर में न फंस जाए।
उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि इस मामले का जल्द निपटारा हो। पश्चिम बंगाल से जुड़ा इस अदालत का पहले से ही एक आदेश मौजूद है।”
‘सभी याचिकाएं यहीं न आएं’
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “हमें स्थिति की जानकारी है। सिर्फ इसलिए कि हमने एक मामले में आदेश पारित किया है, इसका मतलब यह नहीं है कि सभी याचिकाएं यहीं आ जाएं।” वकील ने बताया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय में भी 11 नवंबर तक छुट्टी है।
इस साल 8 जुलाई को पार्टी के विधायकों ऋतब्रत बनर्जी, फिरहाद हकीम, अरूप रॉय, संदीपन साहा, अखरुज्जमां अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मीन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं दायर की गईं। इन पर आरोप है कि टीएमसी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद इन्होंने पाला बदल लिया।
क्या है मामला?
भारतीय जनता पार्टी से चुनाव हारने के बाद टीएमसी में हुए इस घटनाक्रम से पार्टी में फूट पड़ गई। इससे पहले, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष के रूप में नामित किया था। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष ने बागी टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी और एक अन्य बागी विधायक को मुख्य सचेतक नियुक्त कर दिया।
18 जून को, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस के उस फैसले पर कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया, जिसके तहत उन्होंने टीएमसी के बागी गुट के विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया था।
शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर इस पद के लिए अपने नामांकन को खारिज किए जाने और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बनर्जी को ‘नेता प्रतिपक्ष’ नियुक्त किए जाने को चुनौती दी थी। बागी गुट ने दावा किया है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी के कुल विधायकों में से 58 विधायक उनके समर्थन में हैं।
