डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में इन दिनों छात्र आंदोलन और विरोध प्रदर्शनों का एक नया दौर देखने को मिल रहा है। दिल्ली की सड़कों पर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और ‘वोट चोरी’ के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान दो अलग-अलग रणनीतियां खुलकर सामने आईं।
एक तरफ जहां नीट (NEET) पेपर लीक के खिलाफ सफल प्रदर्शन कर चुके कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास… पुलिस की सख्ती और पीस बॉन्ड के दबाव के आगे समझौते की राह पर नजर आए, वहीं ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने इसके ठीक विपरीत रुख अपनाया।
नेहा कई बार इंडी गठबंधन के साथ सुर में सुर मिलाती भी नजर आईं। ऐसे में अब सवाल है कि पीस बॉन्ड को ना कहने वाली नेहा ने क्या अपनी चाल से CJP के तीनों नेताओं को पीछे छोड़ दिया? यह सवाल आज के समय में राजनीति के गलियारों में एक बड़ा बहस का मुद्दा बन चुकी है।
पीस बॉन्ड पर विवाद और क्या है पूरा मामला?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि जब भी पुलिस प्रशासन किसी प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताता है, तो वह प्रदर्शनकारियों से पीस बॉन्ड भरवाकर उन्हें रिहा करती है। लेकिन इस बॉन्ड को लेकर अब तीखा विरोध शुरू हो गया है।
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि ऐसे बॉन्डों को हथियार बनाकर लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों को कुचला जा रहा है। उनके मुताबिक, पीस बॉन्ड पर साइन करना मतलब चुपचाप अपने लोकतांत्रिक असहमति जताने के अधिकार को गिरवी रख देना है। यही वजह है कि उन्होंने बॉन्ड साइन करने के बजाय पुलिस के नोटिस और अपने ऊपर दर्ज मुकदमों के दस्तावेजों की कानूनी रूप से मांग की है।
अब समझिए सीजेपी नेताओं का रुख
अब इसके ठीक उलट, अक्टूबर की शुरुआत में जब CJP के नेताओं अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को दिल्ली पहुंचते ही हिरासत में लिया गया, तो वे सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का अंडरटेकिंग देकर और 50000 रुपये का surety bond भरकर बाहर आ गए।

हालांकि बाद में उन्होंने भी विरोध दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन बार-बार की गई गिरफ्तारियों और बॉन्ड के दबाव के आगे उनका अभियान उस तरह परवान नहीं चढ़ सका जैसा जून-जुलाई में नीट आंदोलन के दौरान देखा गया था।
जून का ‘हीरो’ बनाम अक्टूबर की ‘नई आइकन’
अच्छा, राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह तुलना बेहद दिलचस्प है कि कैसे कुछ ही महीनों में परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया? इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि कुछ ही समय पहले सीजेपी के इन युवा नेताओं ने नीट पेपर लीक के खिलाफ ऐसा जोरदार युवा आंदोलन खड़ा किया था कि तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा था।
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लेकिन अक्टूबर में जब उन्होंने ‘जंतर-मंतर 2.0’ के तहत प्रदर्शन का आह्वान किया, तो दिल्ली पुलिस की भारी बैरिकेडिंग और सख्ती के आगे वे उस मैजिक को दोबारा नहीं दोहरा सके। इसके उलट, AISA नेता नेहा बोरा लगातार पुलिस को चकमा देते हुए सड़कों पर डटी रहीं। कभी कनॉट प्लेस तो कभी आरके आश्रम मार्ग पर उनका पुलिस से लुकाछिपी का खेल सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
राहुल गांधी के साथ भी दिखीं नेहा
अच्छा, अब गौर करने वाली बात यह है कि पुलिस के साख लुकाछिपी करने वाली नेहा थमी नहीं। यहां तक कि जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने विरोध मार्च के दौरान नेहा बोरा के साथ कदमताल की, तो इसने राजनीतिक हलकों में सबका ध्यान खींच लिया। सोशल मीडिया पर भी यह चर्चा आम हो गई कि मौजूदा विरोध प्रदर्शनों में नेहा बोरा एक मजबूत ‘Gen-Z आइकन’ के रूप में स्थापित हो चुकी हैं।

सीजेपी नेताओं को बदल लेनी चाहिए अपनी रणनीति
दिलचस्प बात यह भी है कि इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि समय और राजनीतिक माहौल बदलने के साथ विरोध के तौर-तरीके भी बदलने होते हैं। जहां एक ओर सीजेपी ने खुद को मुख्यधारा की राजनीति से अलग एक ‘प्रेशर ग्रुप’ के रूप में रखने की बात कही है, वहीं कांग्रेस नीत इंडी ब्लॉक और वामपंथी छात्र संगठन इस बार सीधे तौर पर सड़कों पर उतरकर सरकार को घेर रहे हैं।
अब थोड़े दिन पहले की बात को याद किया जाए तो, सीजेपी के सह-संस्थापक सौरव दास ने पहले एक कांग्रेस कार्यकर्ता को सलाह देते हुए कहा था कि यदि पुलिस तुरंत हिरासत में ले रही है, तो अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना चाहिए, दूसरों पर अपनी असफलताओं का ठीकरा न फोड़ें। अब यही बात खुद सीजेपी के भविष्य के कदमों पर भी लागू होती दिखाई दे रही है।
