डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के क्रीमी लेयर मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि 11 मार्च को दिए गए उसके फैसले का असर पहले से हो चुकी नियुक्तियों, प्रमोशन और सीनियरिटी पर नहीं पड़ेगा। यानी पुरानी और पूरी हो चुकी प्रक्रियाएं सुरक्षित रहेंगी और उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा।
मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि जो मामले अभी भी लंबित हैं, उनकी जांच अदालतें व्यक्तिगत रूप से उनके गुणों और उम्मीदवारों की पात्रता के आधार पर करेंगी। कोर्ट ने अपने निर्देशों का पालन करने के लिए केंद्र सरकार को 8 हफ्ते का और समय दे दिया है।
सरकार ने क्या चिंता जताई थी?
बता दें कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर स्पष्टीकरण मांगा था। सरकार का कहना था कि अगर 11 मार्च के फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया, तो इससे सालों पुरानी सरकारी भर्तियां, सर्विस अलॉटमेंट और शैक्षणिक संस्थानों में हुए एडमिशन खतरे में पड़ सकते हैं।
सरकार ने कोर्ट को बताया था कि साल 2016 से 2025 के बीच केंद्र सरकार के विभागों में करीब 5.69 लाख आरक्षित पदों (जिनमें 3.70 लाख ओबीसी पद शामिल हैं) पर भर्तियां की गई हैं।
कैसे पड़ सकता है असर?
ऐसे में अगर पुराना रिकॉर्ड बदला गया, तो साल 2012 के बाद से सिविल सेवा परीक्षा के जरिए हुए सर्विस अलॉटमेंट और अधिकारियों की सीनियरिटी पर भी असर पड़ सकता है। रेलवे, बैंक, पोस्ट ऑफिस और 18 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में भी भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
क्या है क्रीमी लेयर का पूरा विवाद?
गौरतलब है कि यह पूरा विवाद 11 मार्च के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें यह तय किया गया था कि ओबीसी उम्मीदवारों के लिए क्रीमी लेयर की पहचान कैसे की जाए।
कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि केवल माता-पिता की सैलरी के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आता है या नहीं। इसके लिए माता-पिता के पद की श्रेणी और प्रकृति को भी देखना जरूरी है।
अब कोर्ट ने क्या माना?
ऐसे में अब कोर्ट ने माना कि साल 2004 में आया स्पष्टीकरण मूल नियमों के खिलाफ था, जिससे सरकारी और गैर-सरकारी जैसे पीएसयू या प्राइवेट सेक्टर कर्मचारियों के बच्चों के बीच भेदभाव हो रहा था।
दूसरी अहम और बड़ी बात यह है इस पूरे मामले में कि सरकार इस फैसले को चुनौती नहीं दे रही है, बल्कि वह चाहती है कि एक समान व्यवस्था बनाई जाए। इसके लिए केंद्र ने सरकार और गैर-सरकारी नौकरियों के पदों के बीच समानता तय करने और हितधारकों से सलाह लेने के लिए समय मांगा है, ताकि भविष्य की नियुक्तियों में कोई भ्रम न रहे।
