डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ‘तहलका’ के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल की 10 साल की जेल की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को रोक लगाने से इनकार कर दिया। तरुण तेजपाल को नवंबर 2013 में गोवा के एक होटल की लिफ्ट में अपनी एक जूनियर सहकर्मी के साथ बलात्कार करने का दोषी ठहराया गया था।
जज एम.एम. सुंदरेश और जज प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने तेजपाल के ईमेल और मैसेज सहित अन्य दूसरे सबूतों पर गौर करने के बाद उनकी अर्जी खारिज कर दी।
सजा पर रोक लगाने का नहीं मिला आधार
सुनवाई के दौरान बेंच का मानना था कि उनकी सजा पर रोक लगाने के लिए कोई ठोस आधार नहीं बनता है। तेजपाल ने बॉम्बे हाई कोर्ट के छह अगस्त के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाई कोर्ट ने 2021 में ट्रायल कोर्ट द्वारा तेजपाल को बरी किए जाने के फैसले को पलटते हुए उन्हें इस मामले में दोषी ठहराया था।
वकील ने पीड़िता के बयान पर उठाया सवाल
तेजपाल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने घटना के बारे में पीड़िता के बयान पर सवाल उठाए। वकील ने खास तौर पर पीड़िता के उस आरोप पर सवाल किया कि कथित हमले के दौरान लिफ्ट के दरवाजे नहीं खुले थे।
सिब्बल ने दलील दी कि तकनीकी सबूतों से पता चलता है कि जिस दो मिनट नौ सेकंड के दौरान यह कथित घटना हुई, उस समय लिफ्ट के दरवाजे दो बार खुले थे। उन्होंने कहा कि होटल मैनेजर और मित्सुबिशी के कर्मचारियों ने गवाही दी है कि लिफ्ट के दरवाजे हर मंजिल पर अपने आप खुल जाते थे और बटन दबाकर उन्हें बंद नहीं रखा जा सकता था।
जांच अधिकारी सीसीटीवी जब्त नहीं कर सके
तरुण तेजपाल की ओर से पेश वकील कपिल सिब्बल ने जांच पर भी सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच अधिकारी वो सीसीटीवी फुटेज जब्त करने में नाकाम रहे। इस फुटेज से यह पता चल सकता था कि लिफ्ट के दरवाजे खुले थे या नहीं।
उन्होंने यह भी दलील दी कि 22 नवंबर, 2013 को एफआईआर दर्ज होने से पहले पीड़िता ने घटना के बारे में छह अलग-अलग बयान दिए थे। आखिरी में यह भी कहा कि मुकदमे के दौरान तेजपाल जमानत पर थे और उन्होंने अपनी इस आजादी का कोई गलत इस्तेमाल नहीं किया।
