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‘संकीर्ण स्वार्थ की भेंट न चढ़े युवाओं की ऊर्जा’, जागरण साहित्य सृजन सम्मान में बोले राजनाथ सिंह

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक और लेखक नरेन्द्र मोहन जी की जयंती के अवसर पर जागरण साहित्य सृजन सम्मान प्रदान किया गया। लेखक बुद्धिनाथ मिश्र को यह सम्मान मिला। इस मौके पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपना संबोधन दिया। पढ़ें राजनाथ सिंह का पूरा संबोधन…

‘नरेंद्र मोहन स्मृति व्याख्यान’ में, आप सभी के बीच आकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।

हम सभी जानते हैं कि श्री नरेन्द्र मोहन जी ने दैनिक जागरण समूह के प्रधान संपादक के रूप में कार्य किया। उन्होंने पत्रकारिता के उच्च मूल्यों और आदर्शों को सदैव सर्वोपरि रखा। और अपनी लेखनी के माध्यम से पत्रकारिता को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं।

मैं समझता हूं कि दैनिक जागरण आज भी उन्हीं मूल्यों के साथ आगे बढ़ रहा है। मैं श्री नरेंद्र मोहन जी की स्मृति को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

राजनाथ सिंह ने कहा कि श्री नरेंद्र मोहन जी ‘विचार-प्रवाह’ के नाम से एक साप्ताहिक स्तंभ लिखते थे। उस स्तंभ के नियमित पाठकों में से एक मैं भी था। मुझे संसद में उनके साथ करीब से काम करने का अवसर भी मिला। जहां तक मुझे याद है नरेंद्र मोहन जी वर्ष 1996 में राज्यसभा के सदस्य बने थे। उस समय मैं भी राज्यसभा का सदस्य था और बीजेपी का चीफ व्हिप भी था।

संसद में और बाहर भी, उनके साथ बातचीत में हमेशा कुछ नया सीखने को मिलता था। उनके अनुभव, सहजता, सरलता और स्पष्ट शैली ने मुझे हमेशा प्रभावित किया।

जब आपातकाल लगा था, तब 27 जून 1975 के संपादकीय में नरेंद्र मोहन जी ने ‘नया लोकतंत्र? सेंसर लागू, शांत रहें!’ शीर्षक के साथ संपादकीय का स्थान खाली छोड़ दिया था। वह खाली स्थान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंधों के प्रतिकार का प्रतीक था।

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आगे उन्होंने कहा कि, यह बात जगजाहिर है कि नरेंद्र मोहन जी एक पत्रकार होने के साथ-साथ एक साहित्यकार भी थे। वे जितना अच्छा गद्य लिखते थे, उतना ही अच्छा पद्य भी लिखते थे। नरेंद्र मोहन जी की कविताएं जीवन मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और सहृदयता को दर्शाती थीं।

मुझे लगता है कि नरेंद्र मोहन जी की स्मृति में शुरू किया गया ‘साहित्य सृजन पुरस्कार’ उनके लिए एक फिटिंग ट्रिब्यूट है।

इस वर्ष यह पुरस्कार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी को दिया जा रहा है। बुद्धिनाथ मिश्र जी का लेखन विपुल और बहुआयामी है। उनकी साहित्यिक साधना दीर्घ है। उन्होंने नवगीत का परचम देश-विदेश तक फहराया है। मिश्र जी के बारे में कहा जाता है कि अगर आप मिश्रजी से कभी मिलेंगे तो शर्तिया आप उनके स्वभाव और व्यक्तित्व के मुरीद हो जाएंगे।

मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ और इसकी पुष्टि करता हूँ। और श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी को इस सम्मान के लिए बधाई देता हूँ।

साथ ही, ‘जागरण साहित्य सृजन सम्मान’ के लिए इतने योग्य साहित्यकार का चयन करने वाली जूरी को भी मैं बधाई देता हूँ।

उन्होंने कहा कि जब मुझे इस कार्यक्रम का निमंत्रण मिला, तो मुझे तत्काल व्याख्यान का विषय नहीं बताया गया था। मुझे लगा था कि शायद विषय डिफेंस और सिक्योरिटी से जुड़ा होगा।

लेकिन जब मुझे बताया गया कि इस व्याख्यान का विषय युवा पीढ़ी, जेनरेशन गैप और पॉलिसी मेकिंग है, तो मुझे यह विषय बहुत दिलचस्प लगा।

लेकिन, साथ ही मुझे थोड़ी चिंता भी हुई कि मैं इस मंच के माध्यम से युवाओं से क्या कहूँगा? क्योंकि अगर मैंने यह बात की कि “हमारे समय में ऐसा होता था”, तो सारी बात व्यर्थ हो जाएगी। क्योंकि युवा यह लाइन सुनते ही जोन आउट हो जाते हैं।

इसलिए, मैंने यह तय किया कि मैं यह बिल्कुल भी नहीं कहूँगा कि हमारे समय में क्या होता था। बल्कि मैं यह बात करूंगा कि युवाओं की आकांक्षाओं, आशंकाओं, और आवश्यकताओं को समझते हुए कैसे उन्हें नीति निर्माण के माध्यम से एडरेस किया जाए।

मैं यह बात करूंगा कि हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि युवा नीति-निर्माण में सक्रिय रूप से योगदान दें? और युवाओं के लिए नीतियाँ बनाते समय क्या-क्या चुनौतियाँ आ सकती हैं, और उनका समाधान कैसे किया जाए?

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रक्षा मंत्री ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि यह मेरा सौभाग्य है कि सार्वजनिक जीवन में होने की वजह से मैंने कई पीढ़ियों के लोगों के साथ काम किया है। भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता के रूप में, मुझे कई पीढ़ियों के नेताओं के साथ काम करने का अवसर मिला। और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर भी मुझे कई अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों के साथ काम करने का अवसर मिला।

आज भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व श्री नितिन नबीन जी कर रहे हैं। वे हमारी पार्टी के इतिहास में सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। नई पीढ़ी से आते हैं। नई सोच रखते हैं। और कहीं न कहीं हम सब उनसे भी बहुत कुछ सीखते हैं।

इसी तरह, मुझे उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार में भी कई पदों पर रहने का अवसर मिला है। जब मैं पहली बार उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बना था, तब मैंने जिन सिविल सर्वेंट के साथ काम किया उनमें से बहुत से लोग मेरे कन्टेम्पररीज थे। लेकिन आज मेरे साथ काम करने वाले बहुत से अफसर मुझसे 25 से 30 वर्ष तक छोटे हैं।

एक हिसाब से यह कहा जा सकता है कि मुझमें और मेरे मंत्रालय में कार्यरत बहुत से अफसरों और कर्मचारियों के बीच  जेनरेशन गैप है।

लेकिन मैं मानता हूँ कि यह जेनरेशन गैप नहीं है। बल्कि जेनरेशनल कॉनफ्ल्यूएंश है। यानी कई पीढ़ियों का संगम है। हर जेनरेशन के पास कुछ न कुछ देने के लिए होता है।

किसी के पास अनुभव, तो किसी के पास ऊर्जा। ये एक-दूसरे को पूरा करते हैं। अनुभव, ऊर्जा को दिशा देती है और ऊर्जा अनुभव को नई गति।

राजनाथ सिंह ने आगे कहा कि संविधान सभा में ‘संविधान संशोधन’ से जुड़े प्रावधानों पर चर्चा करते हुए डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन के विचार का उल्लेख करते हुए एक महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा था कि हर जेनरेशन एक अलग नेशन की तरह होती है। एक अलग राष्ट्र की तरह होता है। और हर जेनरेशन को अपने बारे में निर्णय लेने का अधिकार है। कोई भी जेनरेशन अगली जेनरेशन को अपने निर्णय मानने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।

डॉ. आंबेडकर का यह विचार केवल संविधान के संशोधन तक सीमित नहीं है। इसके भीतर एक बहुत गहरी लोकतांत्रिक समझ छिपी है कि समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, इसलिए समाज की आवश्यकताएँ भी बदलती हैं।

यह विचार जेनरेशन गैप के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। पीढ़ियों के बीच के अंतर को केवल गैप के रूप में नहीं बल्कि चेंज के रूप में देखना चाहिए।

इसलिए पॉलिसी मेकिंग का उद्देश्य केवल वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करना ही नहीं होना चाहिए। बल्कि नीतियाँ बनाते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आज लिए गए हमारे निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए अवसरों और अधिकारों को कैसे बढ़ाएंगे।

यही सोच हमें इंटर जेनरेशन इक्यूईटी की ओर ले जाती है। इसी सोच के साथ, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में हमारी सरकार आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कार्य कर रही है।

2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य हो, या ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देना हो, या सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को बढ़ावा देना, विकास के केंद्र में आज और कल, दोनों की जरूरतों को रखा जा रहा है।
साथियो,

आज जब हम जेनरेशन गैप और बदलती पीढ़ियों की बात कर रहे हैं, तो दैनिक जागरण की यात्रा इसका एक अच्छा उदाहरण है। वर्ष 1942 में श्री पूरन चंद्र गुप्त जी ने इसकी शुरुआत की। उस दौर में पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बनी थी।

आजादी के बाद बड़े सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव आए। पत्रकारिता करने के तौर तरीके बदले। इसमें तकनीक ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

श्री नरेंद्र मोहन जी, डॉ. महेंद्र मोहन गुप्त जी और श्री संजय गुप्त जी ने इन बदलावों को समझते हुए दैनिक जागरण की विरासत को आगे बढ़ाया। पीढ़ियाँ बदलीं, नेतृत्व बदला, तकनीक बदली, लेकिन श्री पूरन चंद्र गुप्त जी द्वारा स्थापित किया गया पत्रकारिता का वह मूल मूल्य कायम रहा कि ‘समाचार पत्र लोगों की स्वतंत्र आवाज बने’।

दैनिक जागरण की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि जब अनुभव, मूल सिद्धांत और नई सोच साथ चलते हैं, तो जेनरेशन गैप, जेनरेशन ब्रिज बन जाता है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि एक बड़े ही प्रसिद्ध लेखक हुए हैं। जिनका नाम डगलस एडम्स है। जेनरेशन गैप  के संबंध में उनकी एक बात मुझे बहुत प्रासंगिक और सटीक लगती है।

एडम्स के अनुसार जिन चीजों के साथ हम बड़े होते हैं, जिनके बीच हमारा बचपन बीतता है; वे चीजें हमें Natural लगती हैं। सामान्य लगती है। जो चीजें हमारी युवावस्था में आती हैं, वे हमें बहुत रोचक लगती हैं। लेकिन युवावस्था के बाद आने वाली हर चीज़ और हर बदलाव लोगों को अननैचुरल लगते हैं।

मैं समझता हूँ कि इसी कारण से जेनरेशन गैप आता है। क्योंकि जब टेक्नॉलोजी, सोसाइटी और लाइफस्टाइल बदलते हैं, तो वह पुरानी पीढ़ी को असामान्य लगने लगता है। इससे धीरे-धीरे कम्यूनिकेशन गैप आ जाता है। हर जेनरेशन दूसरी जेनरेशन को समझने के बजाय जज करने लगती है।

और धीरे-धीरे पिछली जेनरेशन, अगली जेनरेशन को लेजी या अनटाइटल्ड कहने लगती है। और अगली जेनरेशन पिछली जेनरेशन की सोच को बिना समझे ही नकारने लगती है।

लेकिन सच यह भी है कि आने वाली हर अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी से ज्यादा सेल्फ ड्रिवन होती है। ज्यादा खुले विचार रखती है। डाइवरसिटी को ज़्यादा स्वीकार करती है। नई तकनीक के साथ ज्यादा सहज होती है। और हर अगली जेनरेशन  में अपने विचार व्यक्त करने का अधिक कॉन्फिडेंस  होता है। यही नैचुरल प्रोग्रेशन है।

लेकिन आज की युवा पीढ़ी को भी यह समझना होगा कि उनसे पहले की पीढ़ियों के अपने अनुभव हैं। संघर्षों की सीख है। अनुभव ने उन्हें धैर्य दिया है। और परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझने की क्षमता भी।

इसलिए यह हर जेनरेशन की जिम्मेदारी है कि एक-दूसरे को जज न करें, बल्कि समझने की कोशिश करें। और यह भी सभी की जिम्मेदारी है कि जेनरेशन  गैप, कम्यूनिकेशन गैप न बने; कम्यूनिकेशन गैप, ट्रस्ट गैप न बने; और ट्रस्ट गैप , सोशल गैप न बने।

इसके साथ ही राजनाथ सिंह आगे बोले कि जब भी जेनरेशन गैप और जेनरेशन चेंज की बात की जाती है, तो अक्सर इसे नकारात्मक रूप में देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जेनरेशन गैप के कारण लोगों के बीच केवल दूरी बढ़ती है। और टकराव पैदा होता है।

लेकिन मैं इसे दूसरे तरीके से देखता हूँ। मैं मानता हूँ कि समाज के आगे बढ़ने के लिए जेनरेशन चेंज बहुत जरूरी है। कई जेनरेशंस के बीच होने वाली थेसिस, एंटीथेसिस और स्निथेसिस की प्रक्रिया से ही प्रोग्रेसिव आईडिया सामने आते हैं।

फ्रांसीसी दार्शनिक ऑगस्त कॉम्टे का भी मानना था कि जब दूसरी पीढ़ी आती है, तो उसके साथ नई सोच, नए विचार और बदलाव की नई गति भी आती है। नई पीढ़ी, नए सवाल पूछती है, पुरानी बातों को नए नजरिए से देखती है और इसी प्रक्रिया से समाज आगे बढ़ता है।

इसलिए मैं मानता हूं कि The succession of generations is the moving force in historical progress.

रक्षा मंत्री ने कहा कि अंग्रेजी में एक कहावत है—‘Standing on the Shoulders of Giants (जायंट्स).’ यानी हम अपने पूर्वजों के ज्ञान, अनुभव और उपलब्धियों के आधार पर आगे बढ़ते हैं।

हर पीढ़ी के युवाओं ने अपने समय की समस्याओं को समझा है और कुछ नया करने की कोशिश की है। इसी से नए इनोवेशंस हुए हैं। और इसी से समाज के इवोल्यूशंस की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी है।

आप सोचिए 1947 में ट्रांसिस्टर का आविष्कार हुआ, और यही आविष्कार आज सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के विकास का आधार बना है।

ऐसे ही 1950 में मैथमैटिशयन, एलन ट्यूरिंग ने ट्यूरिंग टेस्ट का विचार सामने रखा और यह प्रश्न उठाया कि क्या मशीनें मनुष्य के समान व्यवहार कर सकती हैं? बाद में लोगों ने इस पर और विचार किया। शोध किए। इन सबने आज के आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) रिवॉल्यूशन का मार्ग प्रशस्त किया।

वर्ष 1987 में वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया के डीएनए में सीक्वेंस की स्टडी की। बाद में इसके आधार पर ही क्रिसपर (सीआरआईएसपीआर) जेन-एडीटिंग टेक्नोलॉजी विकसित की गई।

कहने का मतलब यह है कि जेनरेशंस में बदलाव और गैप हमेशा नेगैटिव ही नहीं होता है। यह नोलेज, इनोवेशन और प्रोग्रेस की निरंतरता का आधार भी है। यानी एक लाइन में कहें तो पीढ़ियों के बदलाव के बीच में ही भविष्य आकार लेता है।

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अपने संबोधन में राजनाथ सिंह ने कहा कि आज समाज में मुख्यतः छह पीढ़ियाँ साथ-साथ मौजूद हैं: साइलेंट जेनरेशन, बेबी बूमर्स, जेन एक्स, मिलेनियल्स, जेन जी और जेन एल्फा।

पहली तीन जेनरेशंस ने एनालॉग टेक्नोलॉजी के दौर में जीवन शुरू किया। इसलिए उन्हें कई बार डिजिटल इमीग्रेंट्स भी कहा जाता है। जबकि मिलेनियल्स ने एनालॉग से डिजिटल की ओर हुए बदलाव को देखा है। और आज की Generation Z (ज़ी) और एल्फा ने इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच अपना जीवन शुरू किया है। इसलिए वे डिजिटल नेटिव्स हैं।

टेक्नोलॉजी के बदलने के कारण, हर पीढ़ी का काम करने का तरीका बदला है। सीखने का तरीका बदला है। संवाद का तरीका बदला है। मनोरंजन का तरीका बदला है। और वैल्यूज भी बदली हैं। हर जेनरेशन के साथ अपने फैसले खुद लेने और अपनी पहचान खुद तय करने की स्वतंत्रता भी बढ़ती गई है।

यह बदलाव बहुत पॉजिटिव है। इसने जीवन को बहुत आसान बनाया है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि आज की पीढ़ी के सामने कोई चुनौती नहीं है।

जैसे-जैसे मौके बढ़े हैं, तो वैसे-वैसे कॉम्पटीशन भी बढ़ा है। आज युवा केवल अपने आसपास के लोगों से नहीं, बल्कि हर दिन सोशल मीडिया के कारण दुनिया भर के लोगों से अपनी तुलना करता है।

एक समय था जब कहा जाता था कि “देखो, शर्मा जी का बेटा कितना अच्छा कर रहा है।” यानी उस समय पड़ोस में रहने वाले शर्मा जी और वर्मा जी का बेटा ही तुलना का सबसे बड़ा पैमाना हुआ करता था। लेकिन आज पूरी दुनिया कनेक्टेड है और शर्मा जी के बेटे की जगह पूरी दुनिया ने ले ली है।

इस क्रोनिक सोशल कमपैरिजन के कारण युवाओं के मन में एक अनजाना सा डर घर कर गया है, जिसे मनोवैज्ञानिक नेमलैस ड्रेड कहते हैं। आज डिप्रेशन और एनजाइटी जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

आज वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे भी है। इसलिए यह बात और भी प्रासंगिक हो जाती है कि हमारे युवा मैटेरिलली वेल्दी होने के साथ-साथ मेंटली हेल्थी भी रहें।

इसके लिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि युवा सेल्फ सेंटर्ड से परपज सेंटर्ड बनें। हमें सेंस ऑफ बिलोंगिंग को बढ़ाना होगा। हमें कॉन्सटैंट कमपैरिजन को भी रोकना होगा। युवाओं को भी यह समझना होगा कि सभी की अपनी-अपनी यात्रा होती है। उन्हें किसी से भी अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए।

जहां तक पॉलिसी की बात है, तो हमारी सरकार ने मेंटल वेलवीईंग को बढ़ावा देने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। नेशनल मेंटल हेल्थ पॉलिसी और मेंटल हेल्थकेयर एक्ट ने अफोर्डेबल और हाई क्वालिटी मेंटल हेल्थकेयर को बढ़ावा दिया है।

इसके अलावा, टेली मानस के माध्यम से लोगों को दूर-दराज के क्षेत्रों में भी मेंटल हेल्थकेयर सर्विस उपलब्ध कराई जा रही है।
साथियो,

आज कई देशों में युवाओं को एक्सेसिव डिजिटल इंटरेक्शन के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। जैसे ऑस्ट्र्रेलिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सारे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स बैन कर दिए हैं। यूके, स्वीडन और स्पेन में भी इसी तरह के इंटरवेनशन किए जा रहे हैं।

हाल ही में, भारत में भी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु निर्धारित की जानी चाहिए। कुछ लोगों को इससे भी आपत्ति होगी। वे इसका भी विरोध करेंगे।

लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि हम सभी स्टेकहोल्डर और एक्सपर्ट्स के साथ विचार-विमर्श करके, युवाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी संभव प्रयास करेंगे।

रक्षा मंत्री ने कहा कि बीसवीं शताब्दी में परमाणु बम को मानवता के लिए बड़ा खतरा माना जाता था। आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) को लेकर भी ऐसी ही आशंकाएँ हैं।

‘If Anyone Builds It, Everyone Dies’; ‘Our Final Invention’; और ‘Will AI Murder Us All?’; ये सभी AI पर लिखी गई किताबों के शीर्षक हैं। इन Titles से ही AI से जुड़े खतरों का अंदाजा लगाया जा सकता है। हो सकता है इनमें बहुत अतिरंजना और अतिशयोक्ति हो। यानी Exaggeration हो। लेकिन इस बात को कोई नहीं नकार सकता है कि AI is Unlike Anything Before.

एआई के कारण सभी क्षेत्रों में परिवर्तन आ रहा है। इसके कारण जॉब्स और Required Skills का नेचर भी तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव को रोकना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन युवाओं को इसके लिए तैयार करना हमारे हाथ में है।

इस दौर में टेक्लोलॉजी स्किल्स के साथ-साथ लीडरशिप, विजन, करेज, और इमोशनल इंटेलीजेंस जैसी क्वालिटी भी बहुत महत्वपूर्ण होंगी। जो युवा अनिश्चितता में निर्णय ले सकेंगे, लोगों को साथ लेकर चल सकेंगे और बदलाव को अपनाने का साहस रखेंगे, वे AI के दौर में भी आगे बढ़ेंगे और भविष्य को गढ़ेंगे।

इसीलिए ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ के तहत शिक्षा में क्रिटिकल थिंकिंग, क्रिएटिविटी, प्रोब्लम सोल्विंग और मल्टीडिसिप्लिनरी लर्निंग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

हमारा प्रयास है कि युवा केवल बदलती टैक्नोलॉजी के इस युग में जॉब सीकर्स न रहें, बल्कि अपनी स्किल्स, लीडरशिप और इनोवेशन के बल पर जॉब क्रिएटर और फ्यूचर लीडर्स बनें।

आगे संबोधन में बोले हर पीढ़ी की अपनी जरूरतें, अपनी आकांक्षाएं और राष्ट्र के प्रति योगदान देने का अपना तरीका होता है। जैसे जब भारत आजाद हुआ, तब सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्र निर्माण की थी। उस समय युवाओं ने राष्ट्र निर्माण को अपना ध्येय बनाया और इसके लिए सभी सुख-सुविधाओं का त्याग भी किया।

मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। आईआईटी खड़गपुर के शुरुआती बैच में एडमिशन के समय इंटरव्यू में छात्रों से एक सवाल अक्सर पूछा जाता था, कि बिहार में बांध बनाओगे या टाटा स्टील में नौकरी करोगे? पर्सनल कंफर्ट या अधिक सैलरी को प्राथमिकता देने वाले स्टूडेंट को अक्सर रिजेक्ट कर दिया जाता था।

और तो और, शुरुआती बैच के विद्यार्थियों के बीच Unwritten Code भी था कि कोई भी पाँच सौ रुपये से अधिक Salary नहीं लेगा। उस समय इस बात की बहुत सराहना भी की जाती थी।

लेकिन क्या आज के युवाओं से भी हमें यही अपेक्षा करनी चाहिए? जबाव है, नहीं। और इसकी जरूरत भी नहीं है।

क्योंकि भारत आज बदल चुका है। आज भारत दुनिया की बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है। आज, वेल्थ क्रिएशन के साथ रोजगार बढ़ता है। इनोवेशन बढ़ता है। और देश आगे बढ़ता है।

यानि अगर आज का युवा बड़ी कंपनी बनाता है, हजारों रोजगार पैदा करता है, नई टैक्नोलॉजी विकसित करता है या दुनिया में भारत की कॉम्पटीशन करने की क्षमता बढ़ाता है, तो वह राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहा है।

इसलिए मैं कहता हूँ कि पीढ़ी बदलती है तो चुनौतियाँ भी बदलती हैं। उनके समाधान के तरीके भी बदलते हैं। और उसके साथ नीतियाँ भी बदलनी चाहिए।

लेकिन एक चीज है जो कभी नहीं बदलनी चाहिए, और वह है देश के लिए कुछ करने और ‘राष्ट्र प्रथम-सदैव प्रथम’ की भावना।

रक्षा मंत्री ने कहा कि एक अच्छी पॉलिसी वह नहीं होती है जो केवल पुरानी व्यवस्था को बचाए रखे। अच्छी पॉलिसी वह भी नहीं होती है जो केवल नई होने के कारण अच्छी मानी जाए।

अच्छी पॉलिसी वह है जो अनुभव से सीखती है, वर्तमान को समझती है और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखती है।

हिन्दी की एक कविता की एक पंक्ति है, जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। वह पंक्ति है; ‘लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है, जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है।”

यानी हमें अपने अतीत से केवल वे चीजें या विचार अपनाने चाहिए जो हमारे विकास के लिए उपयोगी हों। पुरानी और बेकार हो चुकी रूढ़ियों से चिपके रहना प्रगति को रोकता है और यह मृतप्राय होने का संकेत है।

इसलिए, आज जब हम युवाओं के लिए नीतियाँ बना रहे हैं, तो इस बात को ध्यान में रखकर बना रहे हैं।

जैसे आज एक तरफ स्किल इंडिया मिशन के माध्यम से युवाओं को रोजगार के लिए जरूरी स्किल्स प्रदान किए गए हैं, तो दूसरी ओर स्टार्टअप इंडिया के माध्यम से एंटरप्रिन्योरशिप को भी बढ़ावा दिया गया है।

न्यू एजूकेशन पॉलिसी में एक तरफ जहां इंडियन नोलेज सिस्टम को बढ़ावा देने की बात की गई है, वहीं दूसरी ओर मशीन लर्निंग और आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस को भी आगे बढ़ाने की बात की गई है।

पीएम इंटर्नशिप स्कीम के जरिए युवाओं को हैंड्स-ऑन एक्सपीरियंस देने का प्रयास भी किया जा रहा है। वहीं, माय भारत जैसे प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से उन्हें डिसीजन मेकिंग में भी भागीदार बनाया जा रहा है।

हम एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग, कॉमिक्स (एवीजीसी) सेक्टर को बढ़ावा दे रहे हैं। क्रिएटिव इकोनॉमी को बढ़ावा दे रहे हैं। इससे भारत; मीडिया, फिल्म, गेमिंग, म्यूजिक, डिजिटल कंटेंट, ‘वी आर- एक्स आर’ (वीआर-एक्सआर) जैसे क्षेत्रों में एक बड़ा ग्लोबल सेंटर बन रहा है।

वहीं दूसरी ओर हम यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि ट्रेडिशनल इंडस्ट्रीज, मैन्युफैक्चरिंग और एमएसएमईज को भी बढ़ावा मिले। और 2047 तक हम पैंतीस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य प्राप्त करें।

यानी हमारी कोशिश यह है कि हमारा युवा किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रहे और “विकसित भारत” के सपने को साकार करने में अधिक से अधिक योगदान दे।

राजनाथ सिंह ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि युवाओं के विकास के लिए हमारी पॉलिसी कैसी हो, इसको कारपेंटर और गार्डनर के उदाहरण से समझा जा सकता है।

एक कारपेंटर जानता है कि उसे क्या बनाना है। उसके दिमाग में पहले से ही एक तय डिजाइन होता है। वह लकड़ी को उस डिजाइन में ढालता है, जो उसने पहले से सोच रखा है।

लेकिन एक गार्डनर किसी पौधे को आकार नहीं देता। बस पौधे को बढ़ने के लिए पानी देता है, खाद देता है, उसकी रक्षा करता है। और फिर पौधा धीरे-धीरे अपनी प्रकृति के अनुसार विकसित होता है।

मुझे लगता है कि एक अच्छी पब्लिक पॉलिसी का काम भी कारपेंटर जैसा नहीं, बल्कि गार्डनर जैसा होना चाहिए। पॉलिसी का काम ऐसा वातावरण बनाना होना चाहिए जहाँ हर व्यक्ति अपनी प्रतिभा और अपनी रुचि के अनुसार आगे बढ़ सके। और आज हमने इसी दिशा में काम किया है।

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