‘बुद्ध का महाप्रसाद’ कहलाने वाले काला नमक चावल की खेती से किसानों को नई राह दिखाने की कोशिश, सुगंध, स्वाद और पोषण के लिए है खास पहचान
रिपोर्ट – सुशील शर्मा (जिला ब्यूरो चीफ, बस्ती)
रुधौली (बस्ती)। पारंपरिक खेती को नई पहचान देने और किसानों को उन्नत कृषि की ओर प्रेरित करने की दिशा में बस्ती जिले के रुधौली विकासखंड की ग्राम पंचायत हसनी के ग्राम प्रधान सोनू मिश्रा ने अनूठी पहल की है। उन्होंने करीब 80 बीघा भूमि में काला नमक धान की खेती की है। खेतों में लहलहाती इस विशेष धान की फसल क्षेत्र में लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
काला नमक धान अपनी अनोखी सोंधी सुगंध, बेहतरीन स्वाद और विशेष पोषण गुणों के कारण देशभर में अलग पहचान रखता है। इसे भगवान बुद्ध से जुड़ी परंपरा के कारण ‘बुद्ध का महाप्रसाद’ भी कहा जाता है। इसकी खासियत केवल इसका स्वाद ही नहीं, बल्कि इसमें पाए जाने वाले पोषक तत्व भी हैं।

काला नमक चावल क्यों है खास?
ग्राम प्रधान सोनू मिश्रा ने बताया कि काला नमक चावल की प्राकृतिक खुशबू बेहद आकर्षक होती है। पकने के बाद इसमें पॉपकॉर्न जैसी सुगंध महसूस होती है। सामान्य चावल की कई किस्मों की तुलना में इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक बताई जाती है। इसके अलावा इसमें आयरन (लोहा) और जिंक (जस्ता) जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी पाए जाते हैं।
उन्होंने बताया कि काला नमक चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स अपेक्षाकृत कम होने के कारण इसे संतुलित आहार के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि मधुमेह के मरीजों को इसका सेवन अपनी स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।

पारंपरिक धान को मिल रही नई पहचान
सोनू मिश्रा का कहना है कि काला नमक धान की खेती के माध्यम से वह पारंपरिक कृषि उत्पादों को बढ़ावा देना चाहते हैं। उनका प्रयास है कि किसान केवल पारंपरिक धान की किस्मों तक सीमित न रहें, बल्कि बाजार में अलग पहचान रखने वाली फसलों की संभावनाओं को भी समझें।
हसनी में 80 बीघा क्षेत्रफल में की गई यह खेती स्थानीय किसानों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। बड़े पैमाने पर काला नमक धान की खेती से इसकी पैदावार, गुणवत्ता और बाजार में मिलने वाली कीमत को लेकर भी लोगों में उत्सुकता है।
किसानों के लिए खुल सकती हैं नई संभावनाएं
काला नमक धान की खेती यदि उचित तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज, बेहतर प्रबंधन और बाजार की उपलब्धता के साथ की जाए तो यह किसानों के लिए अतिरिक्त संभावनाएं पैदा कर सकती है। सोनू मिश्रा की इस पहल से क्षेत्र के अन्य किसानों को भी इस विशेष किस्म की खेती के बारे में जानकारी लेने और नई कृषि संभावनाओं पर विचार करने का अवसर मिल रहा है।
कुल मिलाकर, रुधौली के हसनी गांव में 80 बीघा में लहलहाती काला नमक धान की फसल पारंपरिक कृषि विरासत को आगे बढ़ाने की एक पहल के रूप में देखी जा रही है। अब सबकी निगाहें फसल की पैदावार, गुणवत्ता और बाजार में मिलने वाले उचित मूल्य पर टिकी हैं।
