महंगी मिसाइलों का किफायती तोड़, कैसे काम करता है ग्लाइड बम; अमेरिका और भारत का प्लान तैयार

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। यूक्रेन संकट और पश्चिम एशिया में जारी लंबे संघर्षों ने आधुनिक युद्धनीति की एक बड़ी कमजोरी उजागर कर दी है- महंगे हथियारों पर अत्याधिक निर्भरता।

बिना आमने सामने की लड़ाई में लंबी दूरी से लक्ष्यों को तबाह करने के लिए मिसाइलें बेहद कारगर तो हैं, लेकिन महीनों खिंचने वाले युद्ध में इनका अंधाधुंध इस्तेमाल किसी भी देश का रक्षा बजट बिगाड़ सकता है।

इसी वित्तीय और रणनीतिक दबाव के बीच दुनिया भर की वायु सेनाएं अब मिसाइलों के एक किफायती विकल्प ग्लाइड बम पर तेजी से काम कर रही है।

इसी रणनीति के तहत अमेरिकी वायु सेना ने अपने एक्सटेंडेड रेंज अटैक म्यूनिशन कार्यक्रम के तहत नए बिना इंजन वाले ग्लाइड बम विकसित करने की योजना पर काम शुरू किया है। वहीं भारत का रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन भी स्वदेशी तकनीकों के दम पर इस क्षेत्र में लंबी छलांग लगा चुका है।

क्या है अमेरिका का नया ERAM ग्लाइड प्लान?

अमेरिकी वायु सेना ने लाइफ साइकिल मैनेजमेंट सेंटर के स्टैंड इन स्ट्राइक डिवीजन ने ERAM प्रोजेक्ट के तहत अनपावर्ड ग्लाइड बम और पावर्ड (इंजन वाले) विकल्पों के विकास की रूपरेखा तैयार की है।

यह प्रस्तावित बम लगभग 500 पाउंड वजनी होगा। इसमें करीब 50 किलोग्राम विस्फोटक वाला विशेष वॉरहेड लगाया जाएगा, जो लक्ष्य के अंदर तक घुसकर धमाका करने और टुकड़ों में बिखरने में सक्षम होगा।

हथियार का न्यूनतम ग्लाइड रेशियो 10:1 और लक्षित रेशियो 15:1 तय किया गया है। इसका सीधा मतलब है कि विमान से गिराए जाने के बाद यह बम अपनी ऊंचाई के मुकाबले 15 गुना ज्यादा क्षैतिज दूरी तय कर सकेगा।

इसी ERAM प्रोग्राम के तहत यूक्रेन और अन्य सहयोगियों के लिए दो जेट पावर्ड क्रूज मिसाइल वेरिएंट्स पर भी काम चल रहा है, लेकिन अनपावर्ड ग्लाइड बम बड़े पैमाने पर लक्ष्यों को नष्ट करने के लिए बेहद सस्ता साधन साबित होंगे।

पारंपरिक बमों को स्मार्ट ग्लाइडर बनाने की तकनीक

अमेरिका के पास पहले से ही बोइंग का जॉइंट डायरेक्ट अटैक म्यूनिशन एक्सटेंडेट रेंज मौजूद है। इस तकनीक में साधारण गुरुत्वाकर्षण बमों पर खास पंख और गाइडेंस सिस्टम फिट कर दिया जाता है।

सामान्य JDAM जहां 24 किमी तक मार करता है, वहीं विंग किट लगने के बाद इसकी रेंज बढ़कर 72 किमी से अधिक हो जाती है। ग्लाइड बमों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि लड़ाकू विमान को दुश्मन के एयर डिफेंस में दाखिल होने की जरूरत नहीं पड़ती। विमान काफी दूर से ही बम रिलीज कर सुरक्षित वापस लौट सकता है।

भारत के अपने ग्लाइड बम प्रोग्राम

भारतीय वायु सेना को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के लिए DRDO और निजी रक्षा क्षेत्र कई एडवांस ग्लाइड बम प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।

1. स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (SAAW)

भारत डायनामिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित यह हथियार विशेष रूप से दुश्मन के एयरफील्ड्स, रनवे और सैन्य बुनियादी ढांचे को नष्ट करने के लिए बनाया गया है।

वर्तमान में इसकी रेंज करीब 100 किलोमीटर है। DRDO अब इसके ‘पावर्ड वर्जन’ पर काम कर रहा है, जिसमें छोटा टर्बाइन इंजन लगाकर इसकी मारक क्षमता दोगुनी यानी 200 किलोमीटर तक की जाएगी

2. गौरव और गौतम ग्लाइड बम

DRDO 500 किलोग्राम और 1,000 किलोग्राम वजन वर्ग में लंबी दूरी के गाइडेड बम तैयार कर रहा है। गौरव सीरीज के बम विंग किट के साथ करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित बंकरों और सैन्य ठिकानों को पिन प्वाइंट सटीकता से तबाह करने की क्षमता रखते हैं।

3. टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑग्मेंटेशन (TARA)

टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑग्मेंटेशन (TARA) किट का काम पारंपरिक, बिना गाइडेंस वाले बमों को सटीक मार करने वाले हथियारों में बदलना है। इस किट के जुड़ते ही सामान्य बमों की रेंज बढ़कर करीब 30 किमी हो जाती है।

4. निजी क्षेत्र की भूमिका

भारतीय निजी रक्षा कंपनी JSR डायनामिक्स ने भी स्वदेशी तकनीक से 120 किमी तक सटीक मार करने वाला ग्लाइड बम विकसित किया है, जो मेक इन इंडिया रक्षा नीति की सफलता को दर्शाता है।

भविष्य में गेम चेंजर साबित होंगे ग्लाइड बम

ये सभी कार्यक्रम दर्शाते हैं कि वायु सेनाएं किस तरह कम लागत वाले सटीक हथियारों का भंडार तैयार कर रही हैं। पारंपरिक बमों के डिजाइन में गाइडेंस किट, विंग्स और कुछ मामलों में छोटे इंजन जोड़कर, वे केवल महंगी क्रूज मिसाइलों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी मारक क्षमता और हथियारों की संख्या बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

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