डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आपातकाल लागू करने के फैसले को एक गलती करार दिया और कहा कि उनका मानना है कि उनकी सास और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी बाद में ऐसा ही महसूस हुआ था।
सोनिया गांधी ने अपनी आगामी पुस्तक ‘बिलांगिंग : अ जर्नी आफ लव’ में यह भी लिखा है कि अगर संजय गांधी को ‘नियंत्रण में’ रखा गया होता तो आपातकाल लागू होने के बाद हुए नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता था।
10 नवंबर को अपने संस्मरण के विमोचन से पहले ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ को दिए साक्षात्कार में सोनिया ने कहा-मुझे हमेशा लगता है कि इंदिरा गांधी दिल से लोकतांत्रिक थीं। मुझे पता है कि कई लोग इस बात पर हंसेंगे, लेकिन मेरा मानना है कि वह आपातकाल के दौरान अपनाए गए रास्ते को लेकर कभी सहज नहीं थीं।
सोनिया के मुताबिक, आपातकाल के फैसले पर परिवार बंटा हुआ था। राजीव गांधी इस कदम के खिलाफ थे। लेकिन, संजय गांधी ने इसका समर्थन किया। उनका तर्क था कि विपक्ष उनकी मां को बर्बाद कर देगा। उन्हें रोकना ही होगा।
सोनिया गांधी ने 1992 में अयोध्या का विवादित ढांचा ढहाए जाते देखकर रोने की बात भी याद की। कहा कि उनको तभी समझ आ गया था कि उस पंथनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी, जिसे बनाने के लिए महात्मा गांधी, नेहरू और उनके साथियों ने संघर्ष किया था।
सोनिया ने यह भी माना कि भाजपा और उसकी हिंदूवादी राजनीति के उभार में कुछ हद तक उनकी अपनी पार्टी की विफलताएं भी जिम्मेदार थीं।
इंदिरा गांधी ने खुद बाद में मांगी थी माफी
सोनिया गांधी ने शनिवार को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक अन्य साक्षात्कार में भी आपातकाल के उथल-पुथल भरे दौर के बारे में बात की। कहा कि इंदिरा गांधी ने बाद में स्वयं सार्वजनिक रूप से आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों पर खेद जताया था और इसके लिए माफी मांगी थी। यह पूछे जाने पर कि संजय गांधी का नाम आपातकाल का पर्याय कैसे बन गया, सोनिया ने कहा-इसमें केवल संजय की भूमिका नहीं थी। इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी काफी दबाव था
लगा जैसे किसी ने मेरे दिल में नश्तर चुभो दिया हो
‘द गार्जियन’ में प्रकाशित पुस्तक अंश के अनुसार, सोनिया गांधी ने उस पल का भी जिक्र किया है, जब राजीव गांधी ने उन्हें बताया था कि इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन ही उनसे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने को कहा गया था। सोनिया लिखती हैं-ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे दिल में नश्तर चुभो दिया हो।
सोनिया ने जान का खतरा बताते हुए जब उनसे प्रधानमंत्री नहीं बनने का आग्रह किया, तो राजीव गांधी का जवाब था-वे वैसे भी मुझे मार डालेंगे।
सरकार की आलोचना से ‘असहज’ था पेंगुइन
सोनिया गांधी ने कहा है कि पुस्तक का प्रकाशक ‘पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया’ सरकार की आलोचना को लेकर ‘असहज’ था। पेंगुइन द्वारा पुस्तक प्रकाशित नहीं करने के फैसले से उन्हें निराशा हुई, हालांकि हैरानी नहीं हुई। ‘द गार्जियन’ के मुताबिक, सोनिया ने इसे अपनी पुस्तक की ‘सेंसरशिप’ की कोशिश के रूप में देखा। बताते चलें, बाद में हार्पर कालिंस इंडिया ने इस पुस्तक का प्रकाशन किया।
खुद राजनीति में जाने के सवाल का गीता से मिला जवाब
अपने संस्मरण में सोनिया ने लिखा है कि राजीव गांधी की हत्या के बाद राजनीति में कदम रखने या नहीं रखने को लेकर वह खुद से जूझ रही थीं। उनके बच्चे राहुल और प्रियंका इसका विरोध कर रहे थे। मेरा एक हिस्सा भी राजनीति की दुनिया से पीछे हटता था। ऐसे में भगवद्गीता ने उनकी दुविधा दूर की और आगे का रास्ता दिखाया।-
(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
