गन्ना और चावल के बाद अब मक्का पर एथनॉल का दबाव; महंगे हो सकते हैं अंडे, चिकन और दूध

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। गन्ने से बड़े पैमाने पर एथनॉल उत्पादन होने लगा तो चीनी संकट हो गया और कीमतों पर दबाव बढ़ा। चावल का इस्तेमाल बढ़ा तो उसकी घरेलू उपलब्धता और कीमतों को लेकर चिंता पैदा होने लगी है। नतीजा हुआ कि गन्ना के प्रमुख स्रोतों से उत्पादित एथनॉल की खरीद बंद करनी पड़ी और चावल से एथनॉल उत्पादन की मात्रा भी सीमित करनी पड़ी।

अब एथनॉल उद्योग की निर्भरता मक्का पर बढ़ने जा रही है। ऐसे में एक खाद्य पदार्थ पर दबाव कम करने की कोशिश का असर दूसरे कृषि उत्पादों पर पड़ सकता है। इस पूरी कवायद के बीच उलझन उपभोक्ताओं की है।

चीनी और चावल के बाद अब मक्का महंगा हुआ तो अंडे, चिकन, दूध और कई प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी दबाव बढ़ना तय है।

दरअसल, तेल कंपनियों ने 2026-27 में 1,100 करोड़ लीटर एथनॉल खरीदने का लक्ष्य रखा है। लेकिन इसके लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के विकल्पों में बदलाव करना पड़ रहा है।

चीनी की घरेलू उपलब्धता बनाए रखने के लिए एक नवंबर 2026 से 31 अक्टूबर 2027 तक गन्ने के रस, चीनी सिरप, चीनी और बी-हेवी शीरे से बने एथनॉल की खरीद बंद कर दी गई है। चीनी निकालने के बाद सिर्फ बचने वाले सी-हेवी शीरे से ही एथनॉल बनाने की अनुमति है।चावल की सीमा भी तय कर दी गई है।

एफसीआई के अतिरिक्त चावल से अधिकतम 324 करोड़ लीटर एथनॉल ही बनाया जाएगा। इसके लिए 72 लाख टन चावल निर्धारित किया गया है। किसी एक डिस्टिलरी के कुल उत्पादन में चावल से बने एथनॉल की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। टूटे चावल से भी अधिकतम 160 करोड़ लीटर एथनॉल बनाया जा सकेगा। इस तरह दोनों स्रोतों से कुल 484 करोड़ लीटर एथनॉल उपलब्ध हो सकेगा। बाकी के लिए मक्का और दूसरे वैकल्पिक अनाज पर निर्भरता बढ़ेगी।

कृषि मंत्रालय के मुताबिक एथनॉल में मक्का की खपत 2026-27 में 1.3 करोड़ टन से बढ़कर 1.6 करोड़ टन पहुंच सकती है। लगभग 30 लाख टन अतिरिक्त मक्का की जरूरत होगी। कमजोर मानसून के चलते शंका है कि इतना मक्का उपलब्ध हो सकेगा।

मंडियों में मक्का के भाव 29 से 30 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुके हैं, जबकि इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,410 रुपये प्रति क्विंटल है।

मक्का की कीमतों में तेजी का असर सबसे पहले पोल्ट्री उद्योग पर पड़ेगा। मुर्गियों के आहार में मक्का प्रमुख घटक है। इसकी लागत बढ़ने से अंडे और चिकन महंगे हो सकते हैं।

डेयरी और पशुपालन में इस्तेमाल होने वाले संतुलित पशु आहार की कीमत बढ़ने से दूध उत्पादन की लागत भी बढ़ेगी। इसके अलावा मक्का से स्टार्च बनाने वाले उद्योग प्रभावित होंगे। खाद्य प्रसंस्करण, कागज, कपड़ा और दवा उद्योगों तक इसकी लागत का असर पहुंच सकता है।

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