एक ही बारिश में दो गांवों की अलग-अलग ‘तस्वीर’, जांच अधिकारी की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
रिपोर्ट:गजेंद्र कुमार गुप्त।
महराजगंज (संवाददाता)।विकसित भारत जीराम जी योजना के तहत कराए जा रहे कार्यों में धांधली और फर्जी हाजिरी का मामला अब प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिलाधिकारी गौरव सिंह सोगरवाल के आदेश पर उपायुक्त श्रम एवं रोजगार गौरवेंद्र सिंह द्वारा की गई जांच अब विवादों के घेरे में आ गई है। आरोप है कि जांच अधिकारी ने एक ही आदेश के तहत हुई जांच में करमहिया ग्राम पंचायत की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया, जबकि बड़हरा चरगहां में तत्परता दिखाते हुए एकतरफा कार्रवाई की पटकथा लिख दी।

दोषी बरी, पर्यवेक्षक पर गाज: न्याय या प्रशासनिक हठधर्मिता?
मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू कार्रवाई का आधार है। जांच रिपोर्ट के आधार पर मुख्य विकास अधिकारी (CDO) महेंद्र कुमार सिंह ने ग्राम विकास अधिकारी पवन कुमार मद्धेशिया पर शासकीय कार्यों में लापरवाही और आदेशों की अवहेलना समेत 8 आरोप लगाते हुए तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। वहीं ग्राम प्रशासक राजकुमार कुशवाहा को नोटिस थमा दिया गया।
परंतु, बड़ा सवाल यह उठता है कि योजना के नियमानुसार ग्राम पंचायत में मजदूरों की हाजिरी (Muster Roll) दर्ज करने की प्राथमिक और सीधी जिम्मेदारी ‘रोजगार सेवक’ की होती है, न कि पंचायत सचिव या ग्राम प्रधान की। पंचायत सचिव का कार्य केवल पर्यवेक्षण (Supervision) का होता है। दर्जनों ग्राम पंचायतों के हजारों कार्यों का बोझ संभाल रहे सचिव को बलि का बकरा बना दिया गया, जबकि फर्जी हाजिरी लगाने के मुख्य आरोपी रोजगार सेवक (सुनीता देवी) को बाइज्जत दोषमुक्त कर दिया गया।

करमहिया में आखिर ‘किस जादू’ से मिले मजदूर?
विगत दिनों हुई मूसलाधार बारिश के दौरान जब प्रतिष्ठित टीवी समाचार चैनलों और दैनिक समाचार पत्रों की मीडिया टीम ने करमहिया गांव में पड़ताल की, तो धरातल पर एक भी मजदूर काम करता नहीं मिला। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जांच अधिकारी गौरवेंद्र सिंह की ‘जादूई जांच’ में करमहिया में सब कुछ मानक के अनुसार सही पाया गया। सवाल यह है कि यदि मीडिया की खबरें झूठी थीं, तो उन समाचार पत्रों और चैनलों पर भ्रामक खबर फैलाने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई।और यदि मीडिया रिपोर्ट सही थी, तो क्या जांच अधिकारी को बारिश में भी कागजों पर मजदूर तैरते नजर आ गए।
‘मैनेज’ हुआ जांच रिपोर्ट! निचलौल से पहुंचा प्रतिनिधिमंडल।
सूत्रों की मानें तो करमहिया ग्राम सभा की जांच रिपोर्ट को प्रभावित करने के लिए निचलौल ब्लॉक से एक प्रभावशाली प्रतिनिधिमंडल ने जिला मुख्यालय पहुंचकर पूरे मामले की ‘सेटिंग-गेटिंग’ की। इसी ‘प्रशासनिक प्रबंधन’ का नतीजा रहा कि करमहिया की ग्राम प्रशासक गंगोत्री देवी, रोजगार सेवक नीलरतन और पंचायत सचिव अब्दुल्ला अंसारी को पूरी तरह बचा लिया गया।
जांच अधिकारी पर दोहरा मापदंड का आरोप।
एक ही बारिश और एक ही योजना में बड़हरा चरगहां पर कड़ा रुख और करमहिया पर मेहरबानी का रहस्य क्या है।
अब सवाल यह उठता हैं कि असली जिम्मेदार कौन।
10 की जगह 100 हाजिरी भरने वाले रोजगार सेवक पर कोई कार्रवाई न होना क्या भ्रष्टाचार को संरक्षण देना नहीं है। क्या जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट पर बाहरी दबाव और ‘मैनेजमेंट’ हावी हो चुका है।जिस तरह से जांच अधिकारी ने करमहिया की रिपोर्ट को नजरअंदाज कर केवल एकतरफा कार्रवाई की है, उससे उच्चाधिकारियों की निष्पक्षता और जांच व्यवस्था पर से आम जनता व कर्मचारियों का विश्वास उठता नजर आ रहा है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस ‘मैनेज्ड’ जांच रिपोर्ट का संज्ञान लेकर निष्पक्ष पुनर्जांच कराता है या फिर लीपापोती का यह खेल यूं ही जारी रहेगा।









