पुणे। दमदार संवाद अदायगी, सहज अभिनय और अपनी बेमिसाल शख्सियत से दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर को पुणे के पास डोणजे स्थित उनके फार्महाउस पर शासकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। पुलिस दल ने उन्हें सलामी देकर अंतिम सम्मान अर्पित किया। अपने प्रिय अभिनेता के अंतिम दर्शन के लिए डोणजे में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर आंख नम थी और हर चेहरे पर नाना को खोने का दर्द साफ नजर आ रहा था।
नाना पाटेकर के निधन से मराठी और हिंदी फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके जाने के साथ ही अभिनय की एक ऐसी समृद्ध और प्रभावशाली यात्रा का अंत हो गया, जिसने कई पीढ़ियों के दर्शकों को अपनी अदाकारी से प्रभावित किया। नाना पाटेकर को गोवा के डोना पावला स्थित अपने निवास पर को अचानक दिल का दौरा पड़ा। तबीयत बिगड़ने पर उन्हें मणिपाल अस्पताल ले जाया गया। चिकित्सकों ने करीब 45 मिनट तक सीपीआर देकर उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।
नाना पाटेकर का पार्थिव शरीर विमान से गोवा से पुणे लाया गया। पुणे हवाई अड्डे से पार्थिव शरीर को डोणजे स्थित फार्महाउस ले जाया गया। अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में प्रशंसक और नागरिक वहां पहुंचे। अपने चहेते कलाकार को अंतिम विदाई देते समय कई लोगों की आंखें नम थीं।
अंतिम विदाई में उमड़ा फिल्म जगत
नाना पाटेकर को अंतिम विदाई देने के लिए राजनीति, समाज और फिल्म जगत की कई नामचीन हस्तियां डोणजे पहुंचीं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पुणे हवाई अड्डे और डोणजे में नाना पाटेकर के अंतिम दर्शन किए तथा उनके परिजनों को सांत्वना दी।
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार, मंत्री चंद्रकांत पाटील, केंद्रीय राज्यमंत्री मुरलीधर मोहोल, रामदास आठवले, सुनील तटकरे, माधुरी मिसाळ, विधायक गोपीचंद पडळकर, अर्जुन खोतकर, रुपाली चाकणकर, सदाभाऊ खोत और उदय सामंत सहित अनेक नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
फिल्म जगत से अभिनेता मकरंद अनासपुरे, नागराज मंजुळे, नीना कुलकर्णी, प्रवीण तरडे, सुरेश वाडकर, पुरुषोत्तम बेर्डे, सुशांत शेलार और लेखक अरविंद जगताप सहित ‘नाम’ फाउंडेशन के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।
संघर्ष से शिखर तक पहुंचा ‘नाना’ का सफरनाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने कठिन संघर्ष किया। वर्ष 1978 में ‘गमन’ फिल्म से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद मराठी और हिंदी सिनेमा में उन्होंने अलग-अलग तरह की भूमिकाएं निभाकर अपनी ऐसी पहचान बनाई, जिसकी कोई दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है।
1989 में आई ‘परिंदा’ उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। इस फिल्म में उनके शानदार अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद ‘अंगार’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी : द म्यूजिकल’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘अपहरण’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया।
‘क्रांतिवीर’ में उनके अभिनय को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वहीं ‘नटसम्राट’ में गणपतराव बेलवलकर की भूमिका ने उनके अभिनय की गहराई और सामर्थ्य को एक बार फिर साबित किया। दूसरी ओर ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी ने दर्शकों को उनके हास्य अभिनय का अलग रंग दिखाया।
पुरस्कारों से सम्मानित, दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे नाना
नाना पाटेकर को तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। अभिनय के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक सरोकारों को भी हमेशा महत्व दिया और ‘नाम’ फाउंडेशन के माध्यम से किसानों तथा सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लोगों की मदद के लिए उल्लेखनीय कार्य किया।
नाना पाटेकर का जाना सिर्फ एक अभिनेता का चले जाना नहीं है। यह उस कलाकार का विदा होना है, जिसकी आवाज में वजन था, संवादों में धार थी और अभिनय में ऐसी सच्चाई थी कि पर्दे पर निभाया किरदार सीधे दर्शकों के दिल तक पहुंच जाता था।डोणजे की धरती ने नाना पाटेकर को आखिरी सलाम तो कर दिया, लेकिन उनका अभिनय, उनकी आवाज और उनकी यादें हमेशा दर्शकों के दिलों में जिंदा रहेंगी।
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— Mnt News Bharat (@mntnewsbharat) October 5, 2026























