पितरों के पूजा का खास पर्व पितृपक्ष की शुरुआत होने वाली है. इस साल 27 सितंबर से पितृपक्ष का शुभारम्भ होगा. पितृपक्ष के 15 दिनों में तर्पण और श्राद्ध का विशेष महत्व होता है. अलग-अलग लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रयागराज, हरिद्वार और काशी सहित दूसरे धार्मिक स्थानों पर आकर उनका श्राद्ध कर्म करते हैं. लेकिन हर किसी के मन में ये सवाल जरूर होता है कि इन सभी धर्म नगरियों में सबसे महत्वपूर्ण कौन का स्थान है.
बीएचयू के ज्योतिष डिपार्टमेंट के प्रोफेसर पंडित सुभाष पांडेय ने बताया कि पितृपक्ष में पितरों की आशीर्वाद पाने के लिए ‘गया’ में श्राद्ध और तर्पण का शास्त्रीय विधान है. लेकिन जो लोग ‘गया’ नहीं जा पाते, उनके लिए अन्य कई जगहें भी हैं जहां वो अपने पितरों का श्राद्ध कर्म कर सकते हैं. इसके लिए सात पुरियां हैं, जिन्हें सप्तपुरी कहा जाता है. इनका वर्णन पुराणों में भी है. ये सप्तपुरियां स्थान है, जो मोक्ष को प्रदान करती है. यानि मनुष्य को यहां जन्म और मृत्यु से चक्र से मुक्ति मिल जाती है.
गया के बाद वाराणसी श्राद्ध के लिए सर्वोपरि
इन सप्तपुरी में अयोध्या, मथुरा, काशी, हरिद्वार, कांची, उज्जैन और द्वारका शामिल है. इन सभी शहरों को धार्मिक शहर कहा जाता है. जो लोग पितृपक्ष में ‘गया जी’ नहीं जा पाते, वो इन स्थानों पर भी आकर यदि अपने पितरों के आत्मा की शांति के लिए पवित्र नदी में स्नान करते हैं और पितरों के निमित श्राद्ध करते हैं, तो इससे उनके पितृ प्रसन्न होते हैं. इन सप्त पुरियों में काशी एक ऐसा स्थान है, जहां गया के बाद सबसे ज्यादा श्रद्धालु पितरों के मुक्ति की कामना से श्राद्ध करने आते हैं.
पिशाच मोचन कुंड है अद्भुत
काशी में पितरों के मुक्ति के लिए पिशाच मोचन कुंड भी है. इस कुंड पर जो भी व्यक्ति पितरों के निमित श्राद्ध और तर्पण करता है, उसके पितरों के मोक्ष का द्वार खुल जाता है. पूरी दुनियां में सिर्फ पिशाच मोचन ही एक मात्र ऐसा स्थान है जहां अकाल मृत्यु में भी मरे मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसके लिए इस कुंड पर खास त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है. इससे प्रेत योनि से भी मुक्ति का मार्ग खुल जाता है. गया जी जाने से पहले भी लोग इसी स्थान पर श्राद्ध कर आगे बढ़ते हैं. पितृ पक्ष के 15 दिनों में यूपी के अलग-अलग जिलों के अलावा बिहार, झारखण्ड, दिल्ली और दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में यहां श्रद्धालु पितरों के पूजा के लिए आते हैं.
गंगा के अवतरण से पूर्व का है इतिहास
काशी खंडोक्त के अनुसार, पिशाच मोचन कुंड को विमल तीर्थ भी कहा जाता है. इसकी उत्पत्ति पृथ्वी पर गंगा का अवतरण से पूर्व माना जाता है. कथाओं के मुताबिक, भगवान शिव के प्रिय भक्त कपर्दी ने इस कुंड की स्थापना की. उनकी कठिन तपस्या से यहां कपर्दीश्वर महादेव प्रकट हुए थे.



















