जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। देश में हाईवे निर्माण की गति से साथ चुनौतियां भी उसी तेजी से बढ़ती जा रही हैं। न तो सड़क दुर्घटनाओं में कमी आ सकी है और न ही हाईवे-एक्सप्रेसवे के निर्माण की गुणवत्ता सवालों के घेरे से निकल सकी। यही नहीं, कई राज्यों में भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों ने भी प्रगति की रफ्तार को प्रभावित किया है।
ऐसी ही तमाम चुनौतियों पर सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने दो दिन तक गुजरात में चिंतन शिविर के अलग-अलग सत्रों में चिंतन किया।
फिलहाल निष्कर्ष यह है कि केंद्र के तमाम तकनीकी प्लेटफार्म जैसे उपाय राज्य भी कर सकते हैं, साथ ही निर्माण की गुणवत्ता और बेहतर डीपीआर के लिए माडल कंसेशन एग्रीमेंट में कुछ विशेष बदलावों सहित मंत्रालय जल्द ही सुधारों का एक रोडमैप भी तैयार कर सकता है।
सड़क परिवहन मंत्रालय का दो दिवसीय चिंतन शिविर संपन्न
गुजरात के नर्मदा जिले में आयोजित दो दिवसीय चिंतन शिविर का समापन मंगलवार को हुआ। जिस तरह से हाल ही में कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे सहित कई परियोजनाओं में सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठे, वह चिंता चिंतन शिविर में भी दिखाई दी।
‘माडल कंसेशन एग्रीमेंट एंड रेटिंग’ पर अलग से सत्र आयोजित किया गया। इसमें बेहतर हाईवे इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए मजबूत प्रोजेक्ट फ्रेमवर्क तैयार करने पर अधिकारियों और विशेषज्ञों ने चर्चा की।
सूत्रों के अनुसार, इन सुझावों के आधार पर जल्द ही मंत्रालय ठेकेदार फर्म, कंसल्टेंट फर्म और अथारिटी इंजीनियरों के लिए माडल कंसेशन एग्रीमेंट में कुछ महत्वपूर्ण और सख्त सुधार कर सकता है।
राज्यों के लिए नए तरह के कान्ट्रैक्टिंग और फाइनेंसिंग मैकेनिज्म अपनाने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई, जिसमें माडल कंसेशन एग्रीमेंट, बीओटी और एन्युइटी-बेस्ड माडल शामिल हैं। यह विचार खासकर स्टेट हाईवे और स्टेट एक्सप्रेसवे के विकास के लिए रखा गया।
सूत्रों ने बताया कि चिंतन शिविर में एक सत्र भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों को लेकर भी था। इसमें विभिन्न राज्यों के भूमि अधिग्रहण संबंधी विवादों का ब्योरा प्रस्तुत किया गया।
इसमें बताया गया कि 38 प्रतिशत मामले इस कारण से हैं कि दावेदार अलग-अलग क्षेत्राधिकार के आसपास गांवों में मिलने वाली अधिक दरों का हवाला देते हैं, जहां विकास बेहतर है।
मंत्रालय जल्द ही सुधारों का एक व्यापक रोडमैप तैयार करेगा
दूसरे नंबर पर ऐसे विवाद हैं, जिनमें जमीन विकसित क्षेत्रों या हाईवे के पास है, लेकिन आधिकारिक रूप से मान्य विकसित सीमा से थोड़ा बाहर हैं। ऐसे मामलों की मात्रा 25 प्रतिशत है। स
र्वे के दौरान ढांचा या निर्माण सही तरीके से दर्ज नहीं होने से मुआवजे में विवाद के चार प्रतिशत और 3.9 प्रतिशत मामले ऐसे हैं, जिनमें जमीन का उपयोग वास्तव में आवासीय या व्यावसायिक होने के बावजूद उसे कृषि मानकर कम मूल्यांकन किया गया है। ऐसे मामलों से निपटारे के लिए भूमि राशि पोर्टल के उपयोग और परिणामों की समीक्षा की गई।
समापन के दौरान सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के सचिव वी. उमाशंकर ने कहा कि इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास का फोकस अब गुणवत्ता पर अधिक है। इस चर्चा का एक मुख्य परिणाम यह निकला कि राज्यों को राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किए गए टेक्नोलाजी प्लेटफार्म और संस्थागत क्षमताओं का फायदा उठाने का मौका मिलेगा।
पीएम गतिशक्ति, डाटालेक, ईडीएआर, कान्ट्रैक्टर रेटिंग सिस्टम और भूमि राशि जैसे प्लेटफार्म को टेक्निकल मदद और क्षमता-निर्माण के सहयोग के साथ राज्य-स्तर के कामों के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है।
एआई आधारित ई-डीएआर प्लेटफार्म का इस्तेमाल अभी नेशनल हाईवे नेटवर्क के लिए हो रहा है, राज्यों को राज्य और स्थानीय सड़कों पर दुर्घटनाओं के पैटर्न का विश्लेषण करने और सड़क सुरक्षा बेहतर बनाने के लिए इससे मदद मिल सकती है, बशर्ते संबंधित सड़क डाटा उपलब्ध हो।





















