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मेघालय के जयंती शक्तिपीठ के दर्शन कराएगा लोकायन समिति:सिसवा में शक्ति आराधना की अनूठी छटा; गुफा रूपी पंडाल में मां जगदम्बा की दिव्यता से गूंजेगा दुर्गा पूजा महोत्सव

मेघालय के जयंती शक्तिपीठ के दर्शन कराएगा लोकायन समिति:सिसवा में शक्ति आराधना की अनूठी छटा; गुफा रूपी पंडाल में मां जगदम्बा की दिव्यता से गूंजेगा दुर्गा पूजा महोत्सव

पूर्वांचल में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले सिसवा के दुर्गा पूजा महोत्सव की तैयारियां तेज हो गई हैं। शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना, भव्य पंडालों और श्रद्धा से सराबोर आयोजनों के बीच पुरानी पुलिस चौकी रोड स्थित लोकायन दुर्गा पूजा सेवा समिति इस वर्ष श्रद्धालुओं को मेघालय के प्रसिद्ध जयंती शक्तिपीठ के दर्शन कराएगी। समिति की यह पहल भक्तों को आस्था, अध्यात्म और धार्मिक परंपरा से जोड़ने के साथ ही पूर्वोत्तर भारत की शक्तिपीठ परंपरा से परिचित कराएगी। समिति अध्यक्ष रामेश्वर जायसवाल ने बताया कि पंडाल निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा है। इस वर्ष गुफा के स्वरूप में पंडाल तैयार किया जा रहा है, जिसके भीतर मां जगदम्बा की भव्य और आकर्षक प्रतिमा स्थापित की जाएगी। गुफा में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को सर्वप्रथम मेघालय स्थित माता जयंती शक्तिपीठ के दर्शन का भावपूर्ण अनुभव मिलेगा। गुफा के मुख्य द्वार पर प्रहरी के रूप में शेर पर सवार गणपति बप्पा विराजमान रहेंगे। मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले के नार्तियांग में स्थित जयंती शक्तिपीठ को नार्तियांग दुर्गा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी स्थान पर माता सती की बाईं जांघ गिरी थी। यहां देवी जयंती अथवा जयंतेश्वरी के रूप में मां दुर्गा की पूजा होती है, जबकि भगवान शिव क्रमदीश्वर या कामेश्वर के नाम से पूजित हैं। यह शक्तिपीठ शिलांग से लगभग 53 से 62 किलोमीटर दूर स्थित है। लोकायन दुर्गा पूजा सेवा समिति की पहचान केवल भव्य पंडाल तक सीमित नहीं है। वर्ष 2008 में समिति ने दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस में माता की पालकी यात्रा की शुरुआत की थी। श्रद्धा से परिपूर्ण यह परंपरा देखते ही देखते पूर्वांचल में प्रसिद्ध हो गई। इसके अगले वर्ष गुदरी गली मेन मार्केट समिति ने भी पालकी यात्रा निकाली। आज करीब एक दर्जन समितियां इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। इस वर्ष भी विसर्जन जुलूस में सैकड़ों महिलाओं द्वारा माता की पालकी यात्रा निकाली जाएगी। मां की जयकारों के बीच निकलने वाली यह यात्रा सिसवा की धार्मिक एकता, नारी सहभागिता और अटूट आस्था का प्रतीक बनेगी।

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