काष्ठ कला दयानंद की, नाम गौरी शंकर का:
रिपोर्:व्यूरो कार्यालय महराजगंज।
महराजगंज।जिले के सिसवां विधानसभा क्षेत्र में श्रेय लूटने की होड़ किस कदर हावी हो चुकी है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट से मिलता है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को भेंट की गई अद्वितीय काष्ठ प्रतिमा के पीछे महराजगंज के ओबरी निवासी कुशल शिल्पकार दयानंद विश्वकर्मा की दिन-रात की मेहनत और हुनर था,परंतु सोशल मीडिया की सुर्खियों में इस कला का श्रेय गौरी शंकर गुप्त उर्फ ‘फौजी भैया’ को दे दिया गया।

श्रम का हनन और सस्ती राजनीति
वायरल पोस्ट में यह दावा किया गया कि गौरी शंकर गुप्त ने अखिलेश यादव से लखनऊ में मुलाकात कर काष्ठ प्रतिमा भेंट की और पार्टी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाई। सवाल यह उठता है कि क्या किसी निष्ठावान कलाकार की साधना को अपने राजनीतिक प्रचार का जरिया बना लेना नैतिक रूप से उचित है? “दयानंद विश्वकर्मा” ने जिस काष्ठ को अपने खून-पसीने से तराशा, उस शिल्प को केवल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा चमकाने का माध्यम बना लिया गया।
कलाकार के अस्तित्व की उपेक्षा:
ओबरी के “दयानंद विश्वकर्मा” जैसे हुनरमंदों को सामने लाने के बजाय, उनका नाम तक न लेकर उनकी वर्षों की तपस्या पर पर्दा डाल दिया गया।
नेतृत्व को गुमराह करने की कोशिश।
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और जनता के समक्ष वास्तविक शिल्पकार की पहचान छिपाकर खुद को कला प्रेमी दिखाना एक राजनीतिक छलावा है।
जनप्रतिनिधित्व की सोच पर प्रश्नचिह्न।
जो संभावित प्रत्याशी एक स्थानीय गरीब कलाकार को उसके काम का श्रेय देने का साहस और ईमानदारी नहीं दिखा सकता, उससे क्षेत्र के सम्मान और अधिकारों की रक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
राजनीति केवल दूसरों के परिश्रम की फसल काटने का नाम नहीं है। सिसवां की जनता को छलावे और कूट-रचित साख के बजाय धरातल पर ईमानदारी से काम करने वाले नेतृत्व की आवश्यकता है, न कि दूसरों के हुनर को भुनाने वालों की।




























