डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। समय याद होगा 1998 में पोखरण के परमाणु परीक्षणों के दौरान भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उनकी टीम ने अमेरिकी जासूसी सैटेलाइटों की नजरों से बचकर इतिहास रच दिया था।
अब बात आज के समय की करें तो उत्तर भारत विशेषकर पंजाब और हरियाणा के खेतों में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार परमाणु बम नहीं, बल्कि पराली जलाने वाले किसान अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे विदेशी सैटेलाइटों की नजरों से बचने के लिए वही पुराने लुक-छिपी का खेल खेल रहे हैं।
सरकारी आंकड़े कहते हैं पराली घटी है, पर क्या सचमुच ऐसा है?
देखिए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में भारी कमी आई है। साल 2021 में लगभग 80000 मामले दर्ज किए गए थे। इसके इतर साल 2025 में यह संख्या गिरकर महज करीब 6000 पर आ गई।
अच्छा गौर करने वाली बात यह है कि सरकार की तरफ से सक्त कार्रवाई, जुर्माने, मशीनों पर सब्सिडी और जागरूकता अभियानों का असर तो जरूर हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे एक और बड़ा कारण है और वो है किसानों का सैटेलाइट की कार्यशैली को समझ जाना।
किसान सैटेलाइटों को कैसे चकमा दे रहे हैं?
इस बात को ऐसे समझिए कि आकाश में चक्कर लगा रहे सैटेलाइट कोई जादुई आंख नहीं हैं जो 24 घंटे हर इंच पर नजर रख सकें।
सीमित समय की खिड़की- बता दें कि वर्तमान में खेतों की निगरानी के लिए मुख्य रूप से चार पोलर-ऑर्बिटिंग (ध्रुवीय कक्षा में घूमने वाले) सैटेलाइटों का उपयोग किया जाता है। NASA के MODIS (Terra और Aqua सैटेलाइट पर) और NOAA/Suomi NPP के VIIRS सेंसर।
नियत समय पर आना- ये चारों उपग्रह दिन में एक या दो खास समय पर ही किसी निश्चित क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हैं। आमतौर पर दिन और दोपहर के वक्त।
अब समझिए चतुराई का तरीका- लगातार ऐसा होने से किसानों को यह बात समझ आ गई है कि उपग्रह कब उनके खेत के ऊपर से गुजरने वाले हैं। वे उपग्रह के गुजरने के उन ऑब्जर्वेशन विंडो यानी समय से पहले या बाद में अपने खेतों में आग लगा देते हैं। ऐसे में जब सैटेलाइट ऊपर से गुजरता है, तो खेत शांत और खाली नजर आते हैं और आग पकड़ में नहीं आती।
इस कमी को दूर करने के लिए आया फायर वॉच प्लेटफॉर्म
अच्छा, इस पूरे मामले में दिलचस्प बात यह है कि इस खेल को बेनकाब करने के लिए, पर्यावरण थिंक-टैंक इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी (iFOREST) ने ‘Fire Watch’ नाम का एक नया मल्टी-सैटेलाइट प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है।
दूसरी बात यह है कि पारंपरिक तरीके केवल जलती हुई लपटों की गिनती करते हैं, लेकिन यह नया सिस्टम कुछ अलग तरह से काम करता है।
सटीक निगरानी- यह MODIS और VIIRS के साथ-साथ Meteosat-8 और Meteosat-9 जो SEVIRI उपकरण ले जाते हैं.. जैसे जियोस्टेशनरी सैटेलाइटों के डेटा को भी जोड़ता है।
हर 15 मिनट में नजर- पोलर सैटेलाइट्स की तरह चक्कर लगाने के बजाय, ये जियोस्टेशनरी उपग्रह एक ही क्षेत्र पर लगातार नजर रखते हैं और लगभग हर 15 मिनट में नई तस्वीरें भेजते हैं। इससे यह पता चल जाता है कि आग असल में किस समय भड़की थी।
नुकसान का सही आकलन- तीसरा, इसमें ‘Sentinel-2’ इमेजरी का उपयोग होता है, जिससे यह मापा जाता है कि जलने से असल में कितनी कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा है, न कि केवल यह देखा जाता है कि कितनी जगहों पर आग जली।
संसद की चिंता और ‘GISAT-1A’ का पेंच
इस बात को ऐसे समझिए हाल ही में 2026 की एक संसदीय स्थायी समिति ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि भारत एक अंतरिक्ष महाशक्ति होने के बावजूद वनों और पर्यावरण में आग की निगरानी के लिए भारी मात्रा में विदेशी उपग्रह प्रणालियों पर निर्भर है। समिति ने अंतरिक्ष विभाग से एक ऐसा घरेलू जियोस्टेशनरी उपग्रह विकसित करने को कहा है जो चौबीसों घंटे निगरानी कर सके।
हालांकि भारत के पास EOS-05 (जिसे GISAT-1A भी कहा जाता है) के रूप में ऐसी ताकत मौजूद है। यह उपग्रह भारत के ऊपर आसमान में एक विशाल सीसीटीवी कैमरे की तरह काम कर सकता है, हर 30 मिनट में पूरे देश की और हर 5 मिनट में चुनिंदा हिस्सों की तस्वीर ले सकता है।
अब समझिए कहां है अड़चन?
EOS-05 एक रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति है, जिसका नियंत्रण रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में आता है। इस वजह से इसका डेटा स्वचालित और अनियंत्रित रूप से नागरिक पर्यावरण एजेंसियों को नहीं मिल पा रहा है।
दूसरी ओर कई वैज्ञानिकों का तर्क है कि यदि इस सैटेलाइट के डेटा का कुछ हिस्सा प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण की भलाई के लिए नागरिक उपयोग के वास्ते खोल दिया जाए, तो पराली और प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई बहुत आसान हो जाएगी।
आग छुपेगी, पर ‘जले के निशान’ कैसे छुपेंगे?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि भले ही किसान जलती हुई आग को सैटेलाइट की मुख्य टाइमिंग से बचा लें, लेकिन जले हुए खेतों के निशान को छिपाना मुमकिन नहीं है।
हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) हाई-रिजॉल्यूशन वाले Cartosat-3 जैसे उपग्रहों की तस्वीरों का उपयोग करके जली हुई कृषि भूमि का नियमित विश्लेषण करता है। आग बुझने के बाद खेत पर छूटे काले निशान सैटेलाइट की नजर में आ जाते हैं।
2. किसान उपग्रहों को कैसे चकमा दे रहे हैं? (समझिए खेल क्या है)आकाश में चक्कर लगा रहे उपग्रह कोई जादुई आंख नहीं हैं जो 24 घंटे हर इंच पर नजर रख सकें।
सीमित समय की खिड़की: वर्तमान में खेतों की निगरानी के लिए मुख्य रूप से चार पोलर-ऑर्बिटिंग (ध्रुवीय कक्षा में घूमने वाले) उपग्रहों का उपयोग किया जाता है—NASA के MODIS (Terra और Aqua उपग्रहों पर) और NOAA/Suomi NPP के VIIRS सेंसर।
नियत समय पर आना: ये चारों उपग्रह दिन में एक या दो खास समय पर ही किसी निश्चित क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हैं (आमतौर पर दिन और दोपहर के वक्त)।
चतुराई का तरीका: किसानों को यह बात समझ आ गई है कि उपग्रह कब उनके खेत के ऊपर से गुजरने वाले हैं। वे उपग्रह के गुजरने के उन ‘ऑब्जर्वेशन विंडो’ (समय) से पहले या बाद में अपने खेतों में आग लगा देते हैं। जब सैटेलाइट ऊपर से गुजरता है, तो खेत शांत और खाली नजर आते हैं, और आग पकड़ में नहीं आती!
