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कागज़ पर ‘पसीने’ की नदियाँ, धरातल पर सन्नाटा: बजहाँ गाँव में ‘अदृश्य’ मजदूरों का महा-अभियान!

रिपोर्ट:गजेंद्र कुमार गुप्त।

महराजगंज। निचलौल ब्लॉक की ग्राम सभा बजहाँ में इन दिनों ‘विकास’ का ऐसा अनोखा और चमत्कारिक मॉडल देखने को मिल रहा है, जिसकी मिसाल शायद पूरे देश में न मिले। यहाँ ‘VGram जी’ योजना के तहत प्राइमरी विद्यालय से पिपरपाती जंगल तक सड़क के दोनों तरफ मिट्टी डालने का कार्य इतनी ‘सूक्ष्म’ और ‘गुप्त’ शैली में चल रहा है कि आम इंसान की आँखों से देखना तो दूर, मीडिया के कैमरों को भी धरातल पर एक भी मजदूर नसीब नहीं हो रहा!

रोजाना कागज़ों पर 84 मजदूरों का पसीना बहाकर विकास का कीर्तिमान रचा जा रहा है, लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि सड़क किनारे केवल झाड़-झंखाड़ मुस्कुराते हुए प्रशासन का स्वागत कर रहे हैं। शायद ये 84 मजदूर ‘अदृश्य शक्ति’ का रूप धारण कर चुके हैं, जो सिर्फ मस्टर रोल पर दस्तखत/अंगूठा लगाने के वक्त ही इस धरती पर अवतरित होते हैं! जब इस अद्भुत ‘मायावी’ विकास का सच जानने के लिए ग्राम रोजगार सेवक जय गिरीश पटेल से संपर्क किया गया, तो उन्होंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी का परिचय देते हुए ऐसा ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला कि हर कोई हैरान रह गया। साहब ने बड़ी साफगोई से फरमाया कि “मैं उस गाँव का रोजगार सेवक ही नहीं हूँ!” धन्य है यह प्रशासनिक प्रतिभा! जो कुर्सी पर तो खुद विराजमान हैं, पर बात जब जवाबदेही की आए तो अपनी पहचान से ही मुकर जाते हैं।

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दूसरी तरफ, ग्राम प्रधान अरविंद कुशवाहा जी की कल्पनाशीलता भी किसी से कम नहीं है। उन्होंने तो अपनी आँखें मूँदकर ऐसा ज्ञान दिया कि “काम जंगल की तरफ से करवाया जा रहा है।” अब जंगल के मंगल में अगर मजदूर ‘अदृश्य’ होकर झाड़ियों के पीछे काम कर रहे हों, तो भला किसी आम नागरिक या मीडिया टीम को कैसे दिखाई दें।

सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी खजाने पर डाका डालने का यह अनोखा खेल इसी तरह कागज़ों और झाड़ियों के पीछे चलता रहेगा? या फिर प्रशासन इन ‘अदृश्य 84 मजदूरों’, ‘पहचान छुपाते रोजगार सेवक’ और ‘जंगल में काम ढूंढते प्रधान जी’ की इस तिकड़ी का हिसाब लेकर सच को उजागर करेगा? फिलहाल तो बजहाँ गाँव में कागज़ी मस्टर रोल दौड़ रहे हैं और सरकारी पैसों की बंदरबाँट पर विकास मुस्कुरा रहा है!