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बहराइच में कभी घर की चारदीवारी में सिमटी थीं:आज 386 महिलाओं की बन गईं आवाज

बहराइच में कभी घर की चारदीवारी में सिमटी थीं:आज 386 महिलाओं की बन गईं आवाज

शमा कौसर की शादी 2021 में हुई। शादी के बाद दो-तीन साल तक उनकी दुनिया घर की चारदीवारी तक सीमित रही। वह कम बोलती थीं। लोगों के बीच जाने और अपनी बात रखने में झिझकती थीं। उन्हें क्या पता था कि एक दिन यही शमा सैकड़ों महिलाओं की ताकत बनेंगी। बच्चों की तबीयत खराब होने के दौरान उनके भाई ने उन्हें देहात संस्था एनजीओ से जोड़ा। यहां से उनकी जिंदगी ने नई दिशा पकड़ी। पहले इंटरव्यू में बदली जिंदगी की राह शमा के लिए घर से बाहर निकलना और अनजान लोगों के बीच अपनी बात रखना आसान नहीं था। जब पहली बार 10-15 लोगों के सामने इंटरव्यू देने पहुंचीं, तो यह उनके लिए बड़ी चुनौती थी। हालांकि, उन्होंने हिम्मत जुटाई और इंटरव्यू दिया। उनका चयन हो गया। यह सिर्फ नौकरी या जिम्मेदारी मिलने की शुरुआत नहीं थी, बल्कि खुद को पहचानने का मौका भी था। साइकिल नहीं आती थी, स्कूटी चलाना सीखा शमा को साइकिल चलानी तक नहीं आती थी। लेकिन गांव-गांव जाकर महिलाओं से मिलने और काम करने के लिए उन्हें स्कूटी चलाना सीखना पड़ा। इस दौरान कई बार गिरीं, चोटें आईं और एक बार सिर भी फूट गया। दर्द हुआ, मुश्किलें आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे स्कूटी चलाना सीख लिया। आज बुर्का पहनकर निकलने वाली शमा स्कूटी से गांवों की गलियां नापती हैं। उनकी यह यात्रा बताती है कि हौसला हो तो रास्ते खुद बनते जाते हैं। 386 महिलाओं की जिम्मेदारी, अधिकारों की लड़ाई आज शमा कौसर 386 महिलाओं का नेतृत्व करती हैं। वह उन्हें खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी देती हैं। बीज का चुनाव, खाद का इस्तेमाल और मिट्टी को बचाने जैसे विषयों पर जागरूक करती हैं। इसके साथ ही सरकारी योजनाओं और महिलाओं के अधिकारों की जानकारी भी देती हैं। उनका प्रयास है कि महिलाएं अपनी समस्याओं को समझें, सवाल पूछें और अपने हक के लिए आवाज उठाएं। थारू महिलाओं का भरोसा जीतना आसान नहीं थारू क्षेत्र की महिलाओं के बीच काम करना शमा के लिए एक अलग चुनौती है। यहां महिलाएं किसी बाहरी व्यक्ति पर जल्दी भरोसा नहीं करतीं। ऐसे में शमा केवल जानकारी देकर लौट नहीं जातीं, बल्कि उनके साथ समय बिताती हैं। उनके घरों और खेतों तक जाती हैं, उनकी परेशानियां सुनती हैं और धीरे-धीरे विश्वास का रिश्ता बनाती हैं। वह जानती हैं कि बदलाव सिर्फ समझाने से नहीं, बल्कि साथ खड़े रहने से आता है। ट्रांसफार्मर ठीक कराया, बिजली बिल माफी में भी मदद शमा का काम सिर्फ महिलाओं को जानकारी देने तक सीमित नहीं है। कुछ दिन पहले एक ट्रांसफार्मर दो-तीन दिन से खराब था। उन्होंने जूनियर इंजीनियर (जेई) से बात की और महिलाओं के साथ मिलकर वीडियो बनाया। इसके बाद ट्रांसफार्मर लगवाने के लिए प्रयास किया। उन्होंने बिजली बिल माफी से जुड़े काम में भी महिलाओं की मदद की। अब वह 21 महिलाओं को सिलाई सिखाने की तैयारी कर रही हैं, ताकि वे हुनर सीखकर आत्मनिर्भर बन सकें। फकीरपुरी से रमपुरवा तक बदलाव की कहानी शमा रोज फकीरपुरी, रमपुरवा, विशुनपुर, घूरेपुरवा और बढ़ीयन पुरवा जैसे गांवों में जाती हैं। अपनी 386 दीदियों के साथ मिलकर वह महिलाओं को जागरूक करने और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए काम करती हैं। कभी शमा घर के एक छेद से दुनिया देखा करती थीं। आज वही शमा सैकड़ों महिलाओं को अपने अधिकारों, संभावनाओं और आत्मनिर्भरता की राह दिखा रही हैं। उनकी कहानी सिर्फ एक महिला के बदलने की नहीं, बल्कि उन तमाम महिलाओं के आगे बढ़ने की उम्मीद है, जिनकी दुनिया कभी घर की दहलीज तक सीमित थी। “मैं शमा हूं, निकाब वाली शमा। और अब मैं बुझूंगी नहीं।”

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