रिपोर्ट: गजेंद्र कुमार गुप्त।
महराजगंज। सरकारें योजनाएं बदलती रहीं, नाम बदलती रहीं और पारदर्शी व्यवस्था का ढिंढोरा भी पीटती रहीं; लेकिन सिसवा ब्लॉक की ग्राम सभा ‘हेवती’ यह साबित करने के लिए काफी है कि हुक्मरान चाहें जितने कानून बना लें, सिस्टम का घुन अपना रास्ता निकाल ही लेता है। प्रशासन ‘डाल-डाल’ चलने का दावा करता है तो हेवती के कर्ता-धर्ता ‘पात-पात’ चलने की विद्या में पारंगत हैं। ग्राम सभा हेवती में इन दिनों कागजी विकास का खेल पूरे शबाब पर है। सरकारी फाइलों और हाजिरी रजिस्टर के पन्नों पर प्रतिदिन 70 मजदूर जी-तोड़ मेहनत कर पसीना बहा रहे हैं, लेकिन जब धरातल पर हकीकत तलाशने की कोशिश की गई, तो विकास की हर साइट पर सिर्फ सन्नाटा पसरा मिला।
कठपुतली बने ‘प्रधान जी ‘राजन’ के हाथ में रिमोट कंट्रोल।
ग्राम सभा में कौन सा काम हो रहा है, कहां मजदूर लगे हैं और कितना बजट किस नाली-खड़ंजे में बह रहा है इसकी जानकारी न तो गांव के चुने हुए ‘प्रधान जी’ को है और न ही रोजगार सेवक को। किसी भी विकास कार्य का हिसाब मांगने पर एक ही जवाब मिलता है “राजन पटेल से बात कर लीजिए!”सवाल उठता है कि ये राजन पटेल कौन हैं।वरुण पटेल उर्फ राजन पटेल, जिनके परिवार ने कभी गांव का नेतृत्व किया था, आज वो पर्दे के पीछे से पूरी पंचायत चला रहे हैं। चर्चा है कि वर्तमान प्रधान ठाकुर प्रसाद को चुनाव में ‘वित्तीय बैसाखी’ (फाइनेंशियल सपोर्ट) देकर प्रधानी का ताज पहनाया गया था। अब प्रधान जी वफादारी का फर्ज निभाते हुए मलाई काटने का पूरा अधिकार ‘सुपर-प्रधान’ राजन पटेल को सौंप चुके हैं।
पड़ताल में खुला कागजी ‘मजदूरी’ और फर्जी एस्टीमेट का सच।
जब हमारी मीडिया टीम रविवार सुबह 10:40 बजे हेवती ग्राम सभा में धरातलीय पड़ताल की, तो भ्रष्टाचार के दो बड़े नमूने सामने आए पहला कार्य प्राइमरी स्कूल से हेवती सिवान तक सड़क किनारे झाड़ी सफाई व मिट्टी कार्य। इसमे अनुमानित लागत ₹1,94,000 लाख।कागजी दावा 50 मजदूर रोजाना।परंतु धरातल की हकीकत मौके पर एक भी मजदूर मौजूद नहीं मिला। तो वही दूसरा कार्य सबया मेन रोड के दोनों तरफ झाड़ी सफाई व मिट्टी कार्य। अनुमानित लागत ₹3,99,000 लाख।कागजी दावा 25 मजदूर रोजाना।धरातल की हकीकत साइट पूरी तरह से सुनसान पाई गई।
लहलहाती फसलों के बीच मिट्टी कार्य का ‘जादू’, लाखों के एस्टीमेट पर उठे गंभीर सवाल।
धरातलीय पड़ताल के दौरान सबसे चौंकाने वाला पहलू एस्टीमेट के खेल में सामने आया। दोनों कार्यों के बजट में ‘झाड़ी कटाई’ के साथ-साथ ‘मिट्टी कार्य’ को भी शामिल कर लाखों रुपये का एस्टीमेट तैयार किया गया है।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वर्तमान समय में सड़क के दोनो तरफ खेतों में धान की लहलहाती फसल खड़ी है। दूर-दूर तक कहीं कोई खाली जगह ही मौजूद नहीं है, जहां से मिट्टी निकाल कर सड़क के दोनों तरफ पटरी की मरम्मत की जा सके। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जब जगह ही खाली नहीं है, तो सड़क के दोनों तरफ मिट्टी का काम कहां और कैसे हो रहा है। साफ जाहिर होता है कि केवल फर्जी ‘मिट्टी कार्य’ दर्शाकर एस्टीमेट की रकम को लाखों तक पहुंचाया गया है। क्या महज झाड़ियों की कटाई में लाखों रुपये खर्च हो जाएंगे। यह अपने आप में एक बड़ा और गहन जांच का विषय है। स्थानीय सूत्रों और पड़ताल से पता चला कि यहां मजदूरों को रोजाना सिर्फ ‘फोटो सेशन’ के लिए बुलाया जाता है। काम करने के बजाय केवल हाजिरी वाली तस्वीर खिंचवाने के ऐवज में मजदूरों को 50 से 100 रुपये थमा दिए जाते हैं और बाकी का पूरा बजट ‘सिस्टम’ और ‘राजन पटेल’ की जेब के हवाले हो जाता है।
नाम बदलने से नीयत कैसे बदलेगी, हुजूर।
भ्रष्टाचार रोकने के लिए सरकार ने एप बनाए, जियो-टैगिंग की और व्यवस्था के नाम बदले। लेकिन जब देखने वाले अफसर वही हैं और काम कराने वाली मानसिकता वही, तो सिर्फ नाम बदल देने से जमीनी धांधली कैसे रुक जाएगी।हेवती का यह मामला सरकारी सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है। देखना यह है कि कागजों पर कुदाल चला रहे इन ‘अदृश्य मजदूरों’, लहलहाती फसलों के बीच फर्जी मिट्टी कार्य दिखाने वालों और पर्दे के पीछे से ग्राम सभा की मलाई चाट रहे ‘शैडो प्रधान’ पर जिले के आला अधिकारी कोई कार्रवाई करते हैं या यह खबरों की सुर्खियां बन कर रह जायेगी।



























