BREAKING
खबरें लोड हो रही हैं...
Home महराजगंज चिताओं की आंच से ठंडी पड़ी ‘पैरोकार’ की राजनीति: पचमा कांड ने...

चिताओं की आंच से ठंडी पड़ी ‘पैरोकार’ की राजनीति: पचमा कांड ने बेनकाब किया सत्ता का दोहरा चरित्र

0
74

निषाद समाज के तीन मासूमों की चिताओं पर डॉ. संजय निषाद की बेरुखी पर उठे सवाल

​रिपोर्ट: गजेन्द्र गुप्ता ,व्यूरो चीफ, महराजगंज।

​निचलौल थाना क्षेत्र के पचमा गांव में एक ही परिवार के तीन मासूम चिरागों का असमय बुझ जाना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस राजनीतिक भरोसे का कत्ल है जिसके दम पर सत्ता के ऊंचे गलियारों में कुर्सियां हासिल की जाती हैं। इस हृदयविदारक हादसे से जहां पूरा महराजगंज जनपद सन्न है, वहीं इस त्रासदी के बीच जो सबसे कड़वा सच उभरकर सामने आया है, वह है—निषाद समाज की रहनुमाई का दावा करने वाले प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद की आपराधिक चुप्पी और गहरी संवेदनहीनता।

वोट बैंक तक सीमित ‘मसीहा’ का दावा

डॉ. संजय निषाद मंचों से गरजकर खुद को निषाद समाज का सर्वमान्य ‘मसीहा’ और पैरोकार घोषित करते नहीं थकते। लेकिन आज जब उसी समाज के एक मजलूम परिवार की देहरी पर दुखों का पहाड़ टूटा है, तो मंत्री जी का दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं है। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या निषाद समाज का अस्तित्व केवल चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने और सत्ता के समीकरण साधने तक ही सीमित है? घटना के दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी कैबिनेट मंत्री या उनके किसी प्रतिनिधि मंडल का पीड़ित परिवार के द्वार न पहुंचना यह साबित करता है कि सत्ता की मखमली परतों के नीचे समाज के प्रति संवेदनाएं पूरी तरह दम तोड़ चुकी हैं।

विपक्ष का संबल और सत्ता की विरक्ति

गहरे शोक की इस घड़ी में जहां राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर विपक्ष ने इंसानियत का फर्ज निभाया, वहीं सत्ता पक्ष की उदासीनता पराकाष्ठा पर रही। कांग्रेस नेता राजू गुप्ता ने पीड़ित परिवार से मिलकर उनका ढांढस बंधाया, तो सपा के पूर्व नेता सुशील टेबड़ेवाल ने समर्थकों संग अंतिम संस्कार में शामिल होकर आर्थिक सहायता देकर संबल प्रदान किया।जिला पंचायत अध्यक्ष रविकांत पटेल ने सांत्वना और आर्थिक मुवावजा दिलाने का आश्वासन दिया।

राजनीतिक ठेकेदारी पर जनता का आक्रोश

निचलौल की जनता अब तीखे शब्दों में पूछ रही है कि निषाद समाज के नाम पर मलाई काटने वाले नेता आज इस सन्नाटे में क्यों दुबके हैं? क्या कैबिनेट मंत्री संजय निषाद और उनके प्रतिनिधि मंडल के लिए सत्ता का सुख और विभागीय जिम्मेदारियां, अपनी ही कौम के तीन मासूमों के खून से भारी हो गई हैं?

​पचमा गांव का यह मातम सत्ताधीशों के दोहरे चरित्र को बेनकाब करता है। वोट की राजनीति के लिए समाज की दुहाई देने वाले नेताओं की यह घोर उपेक्षा और संजय निषाद की यह रहस्यमयी चुप्पी इतिहास में निषाद समाज के साथ हुए सबसे बड़े राजनीतिक छलावे के रूप में दर्ज होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here