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दृष्टिहीन मूर्तिकार रामपाल गणेश उत्सव के लिए बना रहे मूर्तियां:बस्ती में जन्म से दृष्टिहीन होने के बावजूद परिवार के साथ दे रहे मूर्तियों को अंतिम रूप

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दृष्टिहीन मूर्तिकार रामपाल अपनी कला से गणेश उत्सव की मूर्तियों में जान भर रहे हैं। छावनी क्षेत्र के बबुरहवा में रहने वाले रामपाल जन्म से दृष्टिहीन हैं, लेकिन आज वे सबके लिए प्रेरणा बने हुए हैं। वे गणेश उत्सव और लक्ष्मी-गणेश पूजन के लिए मूर्तियां तैयार करते हैं। जन्म से दृष्टिहीन होने पर परिवार वालों का उत्साह अक्सर निराशा में बदल जाता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनकी हिम्मत और हौसले के सामने शारीरिक कमजोरी कभी रुकावट नहीं बनती। वे अपने परिवार का सहारा बनते हैं और दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। कलकत्ता के मूर्तिकार रामपाल ऐसे ही एक व्यक्ति हैं। रामपाल ने बताया कि उनके पिता विनय कृष्णपाल के तीन बेटे थे और तीनों ही जन्म से दृष्टिहीन थे। तीनों बेटों के विकलांग पैदा होने पर पिता को पहले बहुत निराशा हुई। लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने नई उम्मीद और विश्वास के साथ अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का फैसला किया। रामपाल ने बताया कि जब वे 2 साल के थे, तभी पिता ने उन्हें मूर्ति बनाने की कला सिखाना शुरू कर दिया था। इस कला को सीखने में उन्हें करीब 10 साल लग गए। ट्रेनिंग के दौरान पिता ने उन्हें बांस की फट्टी काटना, जोड़ना और घास से बांधना सिखाया। इसके बाद मिट्टी का लेप करने की बारीकियां सिखाईं और उन्हें एक काबिल मूर्तिकार बनाया। रामपाल ने बताया कि मूर्ति बनाने में माहिर होने के बाद वे अपनी पत्नी कंचना पाल, बेटे सौरभ और बहू रीमा के साथ छावनी के बबुरहवा आ जाते हैं। वे गणेश उत्सव और नवरात्रि की मूर्तियां बनाने के लिए लगातार यहां आकर मूर्तियां बनाकर बेचने का काम कर रहे हैं। रामपाल की बनाई मूर्तियों की इतनी मांग है कि गणेश उत्सव और नवरात्रि शुरू होने से पहले ही उनका परिवार सारी मूर्तियों को अंतिम रूप देने में लग जाता है। वे मूर्तियां बनाने के लिए खेत की मिट्टी और हर्बल रंगों का इस्तेमाल करते हैं।