“मौत के बाद तबादला कार्रवाई नहीं है, निलंबन न्याय नहीं है और सरकारी बयान जवाबदेही नहीं है”
भोपाल, 8 सितंबर 2026। मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सागर जिले के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब से हुई मौतों के मामले में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर पूरे मामले की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराने, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और जहरीली शराब के पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करने की मांग की है।
पटवारी ने मुख्यमंत्री को संबोधित पत्र में कहा—
प्रिय मुख्यमंत्री जी,
सागर जिले के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब से हुई मौतों ने पूरे मध्यप्रदेश को झकझोर दिया है। मैं स्वयं पीड़ित परिवारों के बीच गया हूं। जिन घरों में कल तक जीवन था, आज वहां मातम है। इन परिवारों का दर्द सरकार के किसी आंकड़े से नहीं समझा जा सकता। दुर्भाग्य यह है कि मध्यप्रदेश में जहरीली शराब से मौत अब कोई असाधारण घटना नहीं रह गई है। हर बार हादसा होता है, कुछ अधिकारियों के तबादले या निलंबन होते हैं और सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती है। यह परंपरा अब बंद होनी चाहिए। सागर में सामने आए घटनाक्रम ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जब अवैध शराब के कारोबार की सूचनाएं और शिकायतें मौजूद थीं, तब समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? मौतों के बाद कार्रवाई करने वाला तंत्र मौतों से पहले कहां था? प्रमुख सचिव वाणिज्यिक कर अमित राठौर और आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। एसी केबिनों में बैठकर कागजी नीतियां बनाने से जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। जमीन पर मॉनिटरिंग और प्रभावी सुपरविजन किसकी जिम्मेदारी थी? सरकार को इसका स्पष्ट जवाब देना होगा।
घटनाक्रम से यह भी सामने आया है कि संदिग्ध शराब को लेकर विभागीय स्तर पर जांच और कार्रवाई के बीच गंभीर विरोधाभास रहे। पहले कार्रवाई का आदेश और फिर उसमें बदलाव जैसे सवालों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। किसके आदेश पर क्या फैसला हुआ और क्यों हुआ, सरकार यह पूरा सच सार्वजनिक करे। सागर का नेटवर्क केवल स्थानीय स्तर तक सीमित है या इसके तार अंतरराज्यीय अवैध शराब कारोबार से जुड़े हैं, इसकी भी तह तक जाना होगा। यदि ललितपुर से सागर तक नकली शराब पहुंची, तो मध्यप्रदेश की सीमा के भीतर उसे रोकने वाला तंत्र क्या कर रहा था? गुजरात की जहरीली शराब त्रासदी और उज्जैन से सामने आए कथित कनेक्शन पर भी सरकार को जवाब देना चाहिए। उस घटना के बाद मध्यप्रदेश ने क्या सबक लिया? क्या कोई नई गाइडलाइन बनी? क्या संवेदनशील जिलों में विशेष जांच हुई? अगर नहीं, तो क्यों? प्रदेश की डिस्टलरियों को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आते रहे हैं। यदि किसी डिस्टलरी से अवैध शराब के उत्पादन अथवा आपूर्ति की कड़ी जुड़ती है, तो उसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। डिस्टलरी से लेकर गोदाम, लाइसेंसी दुकान और गांव के अंतिम विक्रेता तक पूरी सप्लाई चेन की जांच हो। सागर के इस कांड में स्थानीय भाजपा नेताओं की कथित भूमिका और शराब के कारोबार से उनके संबंधों को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यदि किसी भाजपा नेता या उससे जुड़े व्यक्ति की भूमिका पाई जाती है तो राजनीतिक संरक्षण के नाम पर उसे बचाया नहीं जाना चाहिए।
आबकारी विभाग के संचालन को लेकर ‘विंध्य कोठी’ से रिमोट कंट्रोल जैसे गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। उपमुख्यमंत्री बनाम आबकारी मंत्री जगदीश देवड़ा भी रबर स्टाम्प मात्र बने हुए है वे भी इस पूरे मामले में अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। उनसे भी तत्काल इस्तीफा लिया जाना चाइए। इस पूरे मामले की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराई जाए। मृतकों की प्रमाणित सूची सार्वजनिक की जाए, सभी पीड़ितों को बेहतर उपचार और उचित आर्थिक सहायता दी जाए तथा जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध केवल तबादला या निलंबन नहीं, बल्कि आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाए। जांच यह भी तय करे कि जहरीली शराब बनाने वाला कौन था, उसे उपलब्ध करवाने वाला कौन था, उसे गांवों तक पहुंचाने वाला कौन था और उसे संरक्षण देने वाले कौन थे। सरकार इन सभी प्रमुख मुद्दों को ध्यान रख कर एक श्वेत पत्र जारी करे और ये भी बताए की गुजरात और मुरैना में जहरीली शराब से हुई मौतो के बाद सरकार ने घटना की पुनरावृति रोकने के लिए क्या एक्शन प्लान बनाए थे। मौत के बाद तबादला कार्रवाई नहीं है। निलंबन न्याय नहीं है और सरकारी बयान जवाबदेही नहीं है। सागर के मृतकों को न्याय चाहिए, पीड़ित परिवारों को जवाब चाहिए और मध्यप्रदेश को जहरीली शराब के पूरे नेटवर्क से मुक्ति चाहिए।






































